Monday, 5 September 2016

बस उसे इतना ही बता पाया था के उससे दोस्ती है

हमारे मुहल्ले के अक्लमंद आशिक़ बताते हैं कि दोस्ती के लिए पीला गुलाब होता है और जब किसी से दोस्ती बढ़ानी हो तो शुरुआत पीले गुलाब से ही करनी चाहिए। अग़र किसी की तस्वीर देखकर उसकी आँखों में खोए रह जाए या उसपर कॅामेन्ट नाइस कहकर निकल जाएं और घंटों इस तलब बेचैन रहे कि वो कब लाइक कर उसे रिप्लाई करेगा.. तो उसे इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ेगा। दोस्ती जतानी पड़ती है.. बतानी पड़ती है.. इसलिए कभी-कभार सो काल्ड आशिक़ के फ़ॅारमूले भी अपनानी पड़ती है। अभी टाइम है.. पीला गुलाब दे दीजिए नहीं तो वो दिन दूर नहीं जब वो ख़ुद फिलिंग अमेज़िंग विथ समवन के स्टेटस में आपके साथ 98 लोगों को टैग करके बैठ होंगे और आप हर कॅामेन्ट पर लाल गुलाब की पंखुड़ियाँ नोंच रहे होंगे।

बस उसे इतना ही बता पाया था के उससे दोस्ती है
अब वो मुहब्बते हर दाव को भी समझती दोस्ती है।

नितेश वर्मा
#HappyFriendshipDay #Niteshvermapoetry

कविता लुप्त हो रही थी

कविता लुप्त हो रही थी
उस काल में
जब तुमने थामा था उसे
व्याकरण से छूटकर औंधे मुँह
गिरती उसकी लाचारियों को
अलंकार से पुनः
सुशोभित किया था
और कविता ने
तुमसे खिन्न होकर
तुम्हें यह श्राप दिया था कि
तुम अब सर्वदा सच बोलोगे।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

हम जवां आशिकों के मुहल्लों में

हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती
हमारे पास के किराने की दुकान
चौक पर बीड़ी-पान वाले से पहचान
शाम के लल्लन चचा के समोसे
सर्द बारिश में चाय की चुस्कियाँ
सबकुछ ये बेवज़ह के नहीं होते
कोई लड़की गुजरतीं है जो कभी
हमारे नज़रो से है वाहवाही होती
हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती

लड़कियाँ यूं मुहब्बत का इज़हार
ख़तों के सिलसिले का त्यौहार
नज़र नीचे करके चलने का विचार
लल्लन-छाप लड़को से अंधा प्यार
शायद ही कभी ये सब करती है
उन्हें पता हैं के वो है सही होती
हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती
गुलाबों की दिलचस्पी भी होती है
क़िताबों में उलझी वो भी होती है
ज़ुबाँ पर उनके भी नाम आता है
पर ख़ामोशी भी तो उनमें होती है
उन्हें सुनाया जाता है, रटाया जाता है
वक़्त आने पे घोल पिलाया भी जाता है
सब ग़लत जानकर भी है वो दबी होती
हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती

आवारा लड़को पर चीख़ना भी आता है
झुंझलाहट में सर पटकना भी आता है
हक़ के लिए भी अक़्सर लड़ जाती है
फूल सा होकर उन्हें महकना भी आता है
उन्हें ख़ीच भी आती है इस दकियानूसी से
उन्हें मुहब्बत भी आती है ख़ुशनसीबी से
फिर जाने उनमें कैसी ये है नमीं होती
हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती

फिर ये सब देखते-समझते हुए
आख़िर क्या हो जाता है हमको
क्यूं हम लांछन फ़ेंकते है उनपर
क्या वो अगला मुहल्ला मेरा नहीं
क्या वहाँ की लड़कियाँ अच्छी नहीं
हमें शायद अब ये मान लेना होगा
के उनको भी हैं हक़ हर शौक जीने को
कुछ ज़ुबानी क्यूं है अनकही होती
हम जवां आशिकों के मुहल्लों में
कोई लड़की बदसिरत नहीं होती

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

मैं सरहदों के बीच मुस्तैद होकर

मैं सरहदों के बीच मुस्तैद होकर
ख़ुद को हथियारबंद करकर
एक अम्न क़ायम करने की सोचता हूँ
मैं सोचता हूँ के मुल्कों के बीच
एक मशविरा हो.. सलाहियत हो..
एक-दूसरे पर सच्चा यक़ीन हो
लेकिन मैं कभी ख़ुदसे थक जाता हूँ
हार जाता हूँ ख़ुदके बनाए चोंचले से
इस पाखंडी से शक्ल को ओढ़कर
क्या ये सच नहीं है जहाँ मैं मौजूद हूँ
वहाँ सुकूँ से एक परिंदा भी पर
मारने की कोशिश नहीं करता है
क्या ये विद्रोह है मेरे इस हथियार का
या मैं किसी वीराने में भटक-भटकर
अपने अंदर ही कुछ तालाश रहा हूँ।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

कई दिनों से बतलाया जा रहा है हमें

कई दिनों से बतलाया जा रहा है हमें
सच बोलके झूठलाया जा रहा है हमें।

हमारे चेहरे पर कोई इश्तेहार लगा है
देख हर दफ़ा जलाया जा रहा है हमें।

क्यूं ख़ुदसे ही लड़कर चुप बैठे थे हम
क्यों गुमनाम दिखाया जा रहा है हमें।

अब कोई शर्मिंदगी नहीं है निगाहों में
बेग़ैरती ही जो बताया जा रहा है हमें।

संभालो के फिर से यूं फ़िक्र में है वर्मा
दर्दे-दवा,दुआ दिलाया जा रहा है हमें।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

हर वायदा झूठा निकला आख़िर

हर वायदा झूठा निकला आख़िर
वो शख़्स, वो शाम, वो ज़ुबान
सब.. सब झूठा निकला आख़िर

बेइंतहाई वो मुहब्बत की कसक
दोस्ती में थामी हर करीबी हाथ
निगेहबानियाँ.. ये हमनिशानियाँ
सब.. सब झूठा निकला आख़िर

महज़ ये चंद वक़्तों का फेर था
अपने काम के निकलने के बाद
वो ख़ामोशी में यक़ीन रखने लगा
फिर मेरा इस तरह से आकर
हर अंज़ाम बुरा निकला आख़िर
सब.. सब झूठा निकला आख़िर।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

अब मरहम भी क्या लगाना इस घाव पर

अब मरहम भी क्या लगाना इस घाव पर
शिकस्त तो फिर से खाये है इस दाव पर।

हर तरह से क़ाबिल-ए-तारीफ़ हैं ये मौज़ें
फिर शख़्स क्यों नहीं बैठता इस नाव पर।

जाने कब आग उठेगी ज़िस्म के दरम्यान
ज़िन्दगी भी ये गुजर जाये इस अलाव पर।

मुश्किल है, वो दौर फिर से लौट आने में
दिल हैंरा हैं ख़्वाहिशों के इस लगाव पर।

हर तरफ़ से लौट आया हूँ मैं खाली हाथ
शायद रुकना होगा मुझे इस पड़ाव पर।

मेरे भीतर कई शख़्स चीख़ते हैं रात-दिन
मुझे मरना आता है मेरे इस स्वभाव पर।

नितेश वर्मा

#Niteshvermapoetry