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Tuesday, 4 July 2017

तेरी गुस्ताख़ियों में ये सफ़ेद चाँद भरकर

ख़ास मुहब्बत के दिन.. मुहब्बत करने वालों के लिए..

तेरी गुस्ताख़ियों में ये सफ़ेद चाँद भरकर
तेरे चेहरे को ख़्वाबों की श्रृंगार से सजाऊँ
तेरे हाथों की कंगन कहेंगी बातें जो सारी
तेरी कानों में मैं अपने वो गीत भर आऊँ
तुझपे मैं रख दूँ ये खिलती धूप हसीं सारी
तेरे ज़ुल्फ़ों में कहीं मैं ये दिल छोड़ जाऊँ
हर साँस जब लेंगी करवटें मेरे दरमियान
बहकी उन गर्मियों में मैं ख़ुदको जलाऊँ
होगा दिल-ए-हाल भी क्या, कैसे बताऊँ
यारा मैं इतनी दूर से अब क्या समझाऊँ।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry #Valentine'sDay 😍

जो ग़म की बारिश हो यूं मेरे आँगन कभी

जो ग़म की बारिश हो यूं मेरे आँगन कभी
किसी पन्ने की कश्ती में तेरा चेहरा ना हो।

हो लाख़ बद्दुआ ज़ुबान पर मेरे हम-नवा
मग़र गर्दे या से लिपटा तेरा सेहरा ना हो।

चाहत इस तरह बयान होती है ईश्क की
बिन तेरे तसव्वुर इस धूप में पेहरा ना हो।

बहुत सोचकर समझा था जिसे अपना वो
इस तरह छोड़ेगा के ज़ख़्म गहरा ना हो।

मुझपर मेरा यकीन ज़ालिम रहता है वर्मा
ना सुने मुझे कोई, पर कोई बहरा ना हो।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

यूं ही एक ख़याल सा..

कभी मरते हुए शख़्स को देखा है तुमने? जब वो बिलकुल अपनी आख़िरी साँसें ले रहा हो तब?
नहीं.. कभी नहीं.. या शायद कभी.. ग़ौर ही नहीं किया कभी इनपर।
मरता हुआ शख़्स कभी झूठ नहीं बोलता।
ऐसा भी नहीं है बोलता भी होगा।
तुम्हें बहुत पता है? मरता हुआ आदमी कभी झूठ नहीं बोलता क्योंकि वैसे भी वो अपना सब कुछ छोड़ कर जा रहा होता है.. उसे किसी बात का मोह नहीं होता इसलिए मरता हुआ आदमी कभी झूठ नहीं बोलता।
और वो मरते-मरते अपनी इंसानियत दिखा जाता है.. कुछ ऐसा कहना चाहते हो तुम?
हरगिज नहीं!
मतलब कुछ ऐसा ही निकलता है।
मतलबी मत बनो.. मरते हुए आदमी पर तरस खाओ।
ख़ुद से तमाम तकलीफ़ों को झेल चुका इंसान कभी किसी पर कोई तरस नहीं खाता.. वो तो बहुत पहले ही मर चुका होता है, मुझसे इस तरह की बंधी उम्मीद तो तुम तोड़ ही दो।
फ़िर क्या सोचा है तुमने?
बदला और क्या?
तुम बदला लोगे?
जाहिरी बात है! इस हालात में यहीं करना बेहतर होगा।
तुम मर क्यों नहीं जाते?
मैं तो कब का मर चुका हूँ इसलिए किसी को सुन भी नहीं पाता.. तुम फ़िर से कभी चीख़ कर देखना मैं तुम्हें फ़िर ख़ामोश ही मिलूंगा।
ख़ामोशी तोड़ो और कुछ बोलकर देख लो.. यकीनन तुम्हें कुछ पल को सुकून जरूर आयेगा।
इस फ़रेब से निकलो और मेरी ख़ामोशी को ज़बान देने पर कोई ध्यान मत दो और ना ही इसकी कोई कोशिश करो। ख़ुद से मरा हुआ शख़्स कभी दुबारा ज़िंदा नहीं होता।
तुमसे बहस में कोई मुकाबला नहीं कर सकता।
फ़िर कभी दुबारा मुकाबला करने मत आना अब से.. बाय! करवट फेरो और अब सो जाओ।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry #YuHiEkKhyaalSa

कितनी आग लगी है ज़माने में

कितनी आग लगी है ज़माने में
उम्र गुजर गई है यही बताने में।

मैं फ़िर अपने घर को जाऊँगा
रातें तन्हा रही सहर दिखाने में।

हुआ नहीं जो मेरे दिले-कायल
दर्द-ए-बेज़ुबाँ गुम है सताने में।

कुछ मिला जिनको वो क्या है
हम अधूरे है इस अफ़साने में।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

लाख़ों कोशिशें की थी मैंने, बस इक चाहत में

लाख़ों कोशिशें की थी मैंने, बस इक चाहत में
उसे पा ना सके कभी, ख़ुदाया ये और बात है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

सब कुछ यहाँ अधूरा सा है

सब कुछ यहाँ अधूरा सा है
इम्तिहान के सवालों में ज़वाब जैसा
ग़ज़ल में दो काफ़िये की तरह
बेबह्र नज़्म में रदीफ़ का होना
प्रेम में शिर्क का ज़िक्र होना
दिल टूटने पर दिलजोई करना
मुहब्बत की सौ बातें करना
और भूख से मरके चुप सोना
ख़्वाब आसमान में छोड़ना
आँखों से कइयों बातें करना
मलाल कई लेकर सो जाना
ख़त अधूरा समेटकर लौट जाना
आख़िर अधूरा-अधूरा रह जाना
शायद पूर्णतया यहाँ कोई नहीं
इसलिए भटक रहे हैं क्योंकि..
सब कुछ यहाँ अधूरा सा है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

फ़िर वहीं सब कुछ

फ़िर वहीं सब कुछ
वहीं ज़िक्र
वहीं परेशान मन
वहीं आदत
वहीं ख़लती चुभन
कितना कुछ नहीं बदला ना
ना तुम.. ना मैं
ना ये शह्र.. ना ये लोग
बदला था तो बस इक वक़्त
और वक़्त के जरिये
बदल गई तो बस ये आदतें।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

मुझपर कई ज़ुल्म हुए थे मैंने देखा इक रात

मुझपर कई ज़ुल्म हुए थे मैंने देखा इक रात
उधेड़ कर ज़ख़्मों को मरहम मला कई बार
भीचकर आँखों को.. ख़्वाबों को नोंच डाला
रिहा कर ख़ुदको चल पड़ा पगडंडी सहारे
हमदर्दी से या माँग कर पेट भरी कई पहरे
लानत बरसते आसमान से बरसी थी मुझपे
दुनिया जब सारे ग़म मेरे हिस्से में रख गयी
जब आदम ये शरीर बोझ से दुहरा हो गया
जब आँसुओं से मेरा घर-आँगन भर गया
कुछ नहीं कहना बना था जो इसके सिवाय
मौहलत मिली तो फ़िर लौटकर पूछूँगा ये
आख़िर क्यों हुआ था ये सब कुछ मेरे साथ
मुझपर कई ज़ुल्म हुए थे मैंने देखा इक रात
उधेड़ कर ज़ख़्मों को मरहम मला कई बार।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

क्यूं ज़िन्दगी से कोई खुशी मिली नहीं

क्यूं ज़िन्दगी से कोई खुशी मिली नहीं
किसी मौसम ने मुझपे धूप मली नहीं।

मैं भीगने गया था सर्दियों में ओस तले
कंपकंपाती लब, ज़ुबाँ पर हिली नहीं।

चौराहे पर कई क़ातिल परेशान से हैं
मुहब्बत ही कोई इक संगदिली नहीं।

पत्थर कई बेसब्री हाथों में पड़े हुए है
जान इक बाज़ी है, कोई पहेली नहीं।

सुनके ये क्या हाल होगा उनका वर्मा
मुझमें लगी कई आग पर जली नहीं।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

कमबख़्त वो कितने अच्छे दिन थे

कमबख़्त वो कितने अच्छे दिन थे
जब प्रेम ख़तों के ज़रिये होता था
जब तुम सिमट आती थी मेरी बाहों में
बिन नज़ाकत के बिगड़ैल होकर
जुल्फों को जब खोलकर लेट जाती
मेरे कांधे पर रखकर सर अपना
उंगलियां जब उंगलियों की गिरफ़्त में होती
ख़्वाब जब आसमान में चादर बुनते थे
तुम्हारे छत पर जब चाँद आ रूकता था
मुश्किल होता था मेरा दिल-ए-हाल वो
जब तुम मुस्कुराती मुझे देखकर चुपके से
मैं मर जाता था तुम पर अक्सर वहीं
तुम मुझमें धूप होकर बिखर जाती थी
अब याद अक्सर वो आँसू बनकर आते हैं
कमबख़्त वो कितने अच्छे दिन थे।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

31 जनवरी

31 जनवरी की सुबह आँखें खोलते ही
जब पता चला अब तुम मेरी नहीं रही
वो विवाह आमंत्रण-पत्र मेरे सिरहाने पड़ा था
जिसके हर्फ़-हर्फ़ में आँसू क़ैद थी
दिल जब तकिये तले टूटकर बैठ चुका था
आँसू जब मेरी फैल चुकी थी बिस्तर पर
दादी ने अचानक रेडियो मिला दिया
महेन्द्र कपूर गा रहे थे-
"जाने वो कैसे लोग थे जिनके..
प्यार को प्यार मिला.."
माँ ने मिर्च के फोरन से जब दाल छौंका
सब खाँसते हुए रो पड़े थे आँगन में
पापा जब तुम्हारे घर से आएं मिठाई को खाकर बोले
मिश्रा जी की बेटी का रिश्ता पक्का हो गया
बहन ने लानत भेजते हुए जब अचानक से बुदबुदाया
"मर जाए वो कमबख़्त कहीं जाकर"
माँ ने हौले से मुझे देखा
दादी ने रेडियो बंद कर दिया
मैं कमरे से निकलकर उसके गलियारों में गुम हो गया
सदियों तक मुझे धूप की निगाहें भी ना ढूंढ पायी
शहर में फ़िर अचानक कई नृशंस हत्याएं हुई
ज़ुर्म मेरे नाम पर कोई दर्ज़ नहीं हुआ फ़िर भी
मैं इश्क़ का मारा था.. उसके इश्क़ का।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

ख़ामोश होकर ज़हर हुआ हूँ कई बार मैं

ख़ामोश होकर ज़हर हुआ हूँ कई बार मैं
ख़ुदसे ही माज़े लहर हुआ हूँ कई बार मैं।

बेताबियों को सीने में क़ैद मैंने रखा नहीं
कुछ इस तरह सहर हुआ हूँ कई बार मैं।

वो ग़ज़ल की इक दीवान सी लगती रही
उसे देखकर बेबहर हुआ हूँ कई बार मैं।

इक चिंगारी जिस्म से चिपककर मेरे ही
मुझमें ही तो क़हर हुआ हूँ कई बार मैं।

किस्मत यकीनन साथ नहीं थी मेरी वर्मा
पाग़ल होकर शहर हुआ हूँ कई बार मैं।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

वो कविता थी मेरी उदास सी

वो कविता थी मेरी उदास सी
जिनपर हर्फ़ बेज़ुबान रहते
जिसपर ख़ामोशी तामीर होती
और लड़खड़ाती चल फिरती
जब आँसू क़तार ढ़ूंढ़ते थे
नमीं जब आसमान में होती
दिल भटक जाता था कहीं
चाय की चुस्कियाँ जब
बेमन हलक से उतर जाती
ज़ेहन में उसकी वो
मासूम सी शक्ल फ़िर ढ़ल जाती।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

इस बंज़ारे-दायरे में नजाने कौन आता रहा

इस बंज़ारे-दायरे में नजाने कौन आता रहा
कभी तन्हा, तो कभी बज़्म में उग़ताता रहा।

उसके ज़िस्म को कुरेदते रहें सारी रात हम
सुब्ह फिर खाली हाथ परिंदा पछताता रहा।

ज़ेहनियत बिगड़ चुकी थी दिमाग़ पागल था
इल्मे-याफ़्ता था, एक हद तक शर्माता रहा।

सोचा था सबकुछ वक़्त के मुताबिक़ होगा
फिर हर घड़ी, नजाने क्यूं जी घबराता रहा।

इक घाव ज़िस्म से उतरकर, दिल में फैला
कभी रोया तो कभी थाम के सहलाता रहा।

सुकून क़ैद है कहीं मेरे ही सीने में छिपके
इक डर में मैं ही था, जिसे मैं फैलाता रहा।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

खूँ मेरे ज़िस्म से चिपकती गई सड़ने के बाद

खूँ मेरे ज़िस्म से चिपकती गई सड़ने के बाद
इक दाग़ फिर रह गया घाव उखड़ने के बाद।

कहते हैं सब के अब वो गुमशुदा सी रहती है
मुहब्बत में मुझे दग़ा देकर बिछड़ने के बाद।

मेरे भीतर भी मैं ही चीख़ता रहता हूँ देर तक
अकसर ज़माने से बे-इंतहा बिगड़ने के बाद।

पागल हो जाना चाहता था.. मैं भी आख़िर में
पत्थर उसके हाथों से सर पर पड़ने के बाद।

मेरे मरने पर ये किसको जीना आया था वर्मा
बेवज़ह इतने लाशों से लाश रगड़ने के बाद।

नितेश वर्मा

जब ख़ामोशी ज़ुबाँ क़ैद कर लेती है

जब ख़ामोशी ज़ुबाँ क़ैद कर लेती है
और सुबह का उगता हुआ सितारा
जिस्म पर कई चोटें करता हैं
ज़बान जब लड़खड़ाकर चीख़ती है
और ख़ंज़र जब आसमां से
बारिश के बूंदों के साथ बरसते हैं
नज़ाकत भरी जब कोई फूल यहाँ
मातम के दामन से लिपटती है
तो उस ख़ामोशी का टूट जाना ही
वाज़िब होता है
जो एक साथ तमाम चीख़ों को
किसी सन्नाटे तक ले जाती है और
तब ढ़लता हुआ सूरज बदन पर
मरहम सहलाता हुआ चला जाता है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

यूं ही एक ख़याल सा..

हर शख़्स एक उम्र में आकर परेशान हो जाता है.. उसे तमाम ख़ौफ़ एक साथ सताती हैं, एक साया या हज़ारों अक़्स उसका पीछा करती हैं.. बात-बात पर वो अपनी यकायक सर झटक देता है, कोई ख़याल ज़ेहन में उतरती है तो वो झुंझला जाता है। बनती तस्वीर को बिगाड़ देता है.. हालात, वक़्त, क़िस्मत को कोसता है.. ऊपरवाले से नाराज़गी जताता है या फ़िर सबसे हारकर.. उदास होकर ख़ामोश बैठ जाता है।
लेकिन वो शख़्स अपने किसी बुरे हालात में किसी के सामने मिन्नतें नहीं करता.. हाथ नहीं फ़ैलाता.. किसी की जी-हुजूरी नहीं करता, फ़िर यकीन मानिये वहीं एक शख़्स इतिहास लिखता है.. बाक़ी सारे क़िस्सों-कहानियों में सिमट जाते हैं।
अपने हालातों से ही जीतकर कोई कामयाब होता है, किसी मंजिल को पाता है.. नाम कमाता है, इतिहास लिखता है या फ़िर मिट्टी में राख़ होकर सिमट जाता है। दफ़्न होता है लेकिन उफ्फ़ नहीं करता.. आँखें फ़िर ज़माने भर की कराहती हैं, वो ऊपर से ख़ामोश सब देखता रहता है लेकिन वहाँ भी कोई मिन्नत नहीं करता.. या शायद वो पत्थर हो जाता है।
P.S.- अब ख़िड़की से बाहर ना देखिये आसमां नहीं पिघल रहा कोई। 😉

तमाम दर्द सीने के खुलकर ज़मीं पे बिखर गए
हमने सोचा ही ना फ़िर हम ख़ुदाया किधर गए।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry #YuHiEkKhyaalSa

उस सर्दियों की शाम में जब उदासी

उस सर्दियों की शाम में जब उदासी
मेरे कमरे के दहलीज़ पर आयी थी
लिहाफ़ में अकड़ता हुआ बदन
जब आलस्य को समेटे हुए गुम था
यौवन सौलहवाँ का ढ़लकर
जब चेहरे पर बिखरी पड़ी हुई थी
इक कंपकंपाती आवाज़ गर्माहट भरे
कानों में घुल गई थी यकायक
बस ख़यालों में तेरे दस्तक देने पर।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

उसका चिड़चिड़ापन उसकी बेबसी की निशानी है

उसका चिड़चिड़ापन उसकी बेबसी की निशानी है
वो बिगड़ैल किरदार से भरी एक उदास कहानी है।

वो कमरा जो तहख़ाने के अन्दर बनवाया था उसने
उससे ही ये बात खुली की दयारे-तस्वीर पुरानी है।

मेरे लब्ज़ ख़ामोश होके करवटें लेते रहे तमाम उम्र
किताबी किस्से की तरह ही ये भी एक बेईमानी है।

दिल मुंतज़िर था बरसों से एक उसके आ जाने को
पत्थर पिघल गये आँसू से वो दर्द सारी बेज़ुबानी है।

अब जो जल चुका हूँ, तो राख़ देखने बैठ गये वर्मा
जो ज़िंदा था तो कुरेदते थे अब छोड़ो ये नादानी है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

The way

The way.. they refuses me
Once in a way they uses me
But it's okay!
It's happen in everyone's life
Everyone take lessons from their life
Everyone charged through their life
Good or bad, hopes or sadness
Everything comes in their life
Thought will be meaningful by the
Action of damn human behaviour
Full of disappointment after the failure
It's a not a big issue
But the way,
by which you take this failure is issue
The way.. they refuses me
Once in a way they uses me.

#Niteshvermapoetry #TheWay