Wednesday, 5 November 2014

बचा अब-तक उसका गुरूर कितना हैं

बचा अब-तक उसका गुरूर कितना हैं
पहल-इश्क में था तो सुरूर कितना हैं

दिल किसी के ना होनें तक ही रिहा हैं
गैर की बाहों में महबूब क्रूर कितना हैं

मिला हैं जो वो तो पैगाम भी लाया हूँ
कब्र पे उसकें यें मिट्टी हुज़ूर कितना हैं

खुद की स्याहीं से मुझे बुनाया जिसनें
बहन की आँखों में बचा नूर कितना हैं

तौलतें रहें थे ता-उम्र अँधेरें में आकर
सबेरा देखा बाप ये मजबूर कितना हैं

निहार के उसनें गला ही घोंट दिया हैं
ये पडोसी मुल्क भी नासूर कितना हैं

नितेश वर्मा

Ummed E Kashmir By Nitesh Verma

A tribute to #IndianSoldiers,Thanks for everything.
#UmmedEKashmir #HumHain

बचा अब-तक उसका गुरूर कितना हैं
पहल-इश्क में था तो सुरूर कितना हैं

निहार के उसनें गला ही घोंट दिया हैं
ये पडोसी मुल्क भी नासूर कितना हैं

नितेश वर्मा

Nitesh Verma Poetry

कब, किससे, कहाँ, कितना, क्यूं और कैसे बोलना हैं; यह एक इंसान के समझ में होना चाहिएं वर्ना उसके बाद उस इंसान के पास पछतावा करनें के सिवा और कुछ नहीं बचता।

नितेश वर्मा

दीवाली ये खुशियाँ लेकर आई हैं

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। आप सभी का जीवन ऐसे ही जगमगाता रहें। शुभ-दीपावली।

चारों तरफ़ अब रौशनी छाई हैं
दीवाली ये खुशियाँ लेकर आई हैं

दीयें से खिली हर इक घर हैं
रंज़िशें कही दूर जा दफ़नाई हैं

सुख-शांति-समृद्धि सब आपकी हो
दिलों में यही चाह समाई हैं

लेकर उड गया मन बावरां कहीं
नफ़रतें-कुरीतियाँ दी आज़ जलाई हैं

सब अपनें साथ अपनों के रहें
यहीं तो सबकी अरजी कमाई हैं

नितेश वर्मा

अब ये ज़िन्दगी इक फासलों से गुजर रही हैं

अब ये ज़िन्दगी इक फासलों से गुजर रही हैं
बेकसक, बेअदब मौत मंज़रों से गुजर रही हैं

आँखों से हटा नहीं हैं पर्दा अब तक मेरे आकाँ
ये दुश्मनी हैं जो अब इक रिश्तों से गुजर रही हैं

दिल बेचैंन हैं तो हवा भी ना मिली हैं साँसों को
उल्फ़त के हैं जो मारें तो जाँ यूं हीं गुजर रही हैं

आँखों में शर्म अब किस बात की रहें अए वर्मा
जब हर तकलीफ़ों से ही ये ज़िंदगी गुजर रही हैं

नितेश वर्मा

इश्क में ना-जानें हम क्या-क्या कर आएं हैं

सारें ही बहानें अब तक वर्मा मैनें अपनाएं हैं
इश्क में ना-जानें हम क्या-क्या कर आएं हैं

दिल अपना ही कहीं इन अंधेरों में पडा रहा था
और ना-जानें इल्ज़ाम किस-किस के सर कर आएं हैं

नितेश वर्मा

वो कैसा हमदर्द हैं [Wo Kaisa Humdard Hai]

वो कैसा हमदर्द हैं
जो दे गया
मुझे बस दर्द हैं!

हवाएँ सर्द सी
चेहरा ज़र्द सा
चला था सब बस फर्ज़ सा!

तन्हा, उदास
था शायद वो मर्ज़ सा
ये ज़ुबां मेरा हैं बस दर्द का!

सुकूं अब कहीं नहीं
रहा कैसे
दिल मेरा ये खर्च सा!

टूटतें लफ़्ज़ बहकतें बातें
लिखता रहा कैसें
मैं भरा जोश गर्म सा!

टूट के बिखर गए अपनें सब
मगर
आँखों में दिखा नहीं कुछ शर्म सा!

नितेश वर्मा