Thursday, 1 January 2015

लो हार गया मैं आके आगे फिर से,उसकी ज़िद से

फिर से वही इक नाकाम कोशिश, उसकी ज़िद से
लो हार गया मैं आके आगे फिर से,उसकी ज़िद से

बता रही थीं वो भरी महफिल में यूं मुहब्बत मुझे
हो गया मैं रौशन बिखर के तन्हा, उसकी ज़िद से

बेखबर वो इस खबर से,ज़िंदा हैं इक लाश कब्र पे
क्यूं हो जाता हूँ मैं बेबस अक्सर, उसकी ज़िद से

नितेश वर्मा


उसके ना होने से, ये दिल मेरा टूटा हैं

क्यूं मुझसे मेरा इक ये हिस्सा छूटा हैं
उसके ना होने से, ये दिल मेरा टूटा हैं

कसमें,वादें,इरादें सब उसकी शर्तों से
जानें क्यूं अभ्भी वो मुझसे यूं रूठा हैं

अब तो माँगकर ही रहता हैं ज़िंदा वो
किस कदर वो इक शख्स मेरा लूटा हैं

इक इमान के खातिर जो परेशां रहा
क्यूं कहतें रहें लोग शख्स वो झूठा हैं

नितेश वर्मा


बहोत तकलीफ होती हैं जब हार अपनी होती हैं..

बहोत तकलीफ होती हैं जब हार अपनी होती हैं..

नितेश वर्मा

बिछडतें वो ख्वाब सारें एक धुएं के पीछें हैं

बिछडतें वो ख्वाब सारें एक धुएं के पीछें हैं
नजर जाती नहीं नजर एक धुएं के पीछें हैं

मिलता नहीं हैं सुकून बिन उसके कहीं तो
ज़िन्दा वो लाश, मगर एक धुएं के पीछें हैं

यूं फेरती निगाहें,वो जुल्फें संवारती रहीं हैं
सवालें करती अखबार एक धुएं के पीछें हैं

सबर से इम्तिहान,कबर पे मातम देखा हैं
उस आँखों से की बौछर एक धुएं के पीछें हैं

नितेश वर्मा


इक जुर्म हैं मुझपर

इक ज़ुर्म हैं मुझपर
सर इक खून हैं मुझपर
रीति-रिवाजों से परें
इन सामाजों से परें
हुई थीं इक भूल
इस भूल से
के वो इक जान हैं मुझपर
मेरी बाहों की
मेरी रातों की
चैंन से बेचैंन होती
मेरें दिल से लगी खंज़र
वो इक हथियार हैं मुझपर
इक जुर्म हैं मुझपर
सर इक खून हैं मुझपर

बहोत दिनों तक
यूं ही चलती रहीं
जैसे कोई भारी
किताब हो मुझपर
सयानें लफ़्ज़,दोषी जुबाँ
मरते रहें यूं ही
जैसे हो सजदें में कोई दुआ
हार के इक शमां हैं बाँधी
जैसे ये ज़िन्दगी हैं
इक उधार मुझपर
इक जुर्म हैं मुझपर
सर इक खून हैं मुझपर

नितेश वर्मा

वो बाहों में किसी और के हैं, बात क्या करें

रात ये उल्फत की हैं इंतज़ार अब क्या करें
वो बाहों में किसी और के हैं, बात क्या करें

समझातें रहें थें लबों की नर्मी से जिसे हम
जिद उनकी पागल करनें की हैं तो क्या करें

नितेश वर्मा

मैं साँसें उनके मुलाकात में लिये बैठा हूँ

इक खामोशी में, इक बात लिये बैठा हूँ
इस दिल पे मैं इक किताब लिये बैठा हूँ

वो कितना पूछतें हैं मुझसे ये पता मेरा
मैं साँसें उनके मुलाकात में लिये बैठा हूँ

नितेश वर्मा