Saturday, 5 March 2016

हर पढ़ीं हुयी चीज को पढ़ना आसान है

हर पढ़ीं हुयी चीज को पढ़ना आसान है
बातों ही बातों में दिल रखना आसान है।

इश्क़ तो कभी तुमसे किया जाता नहीं
और कहते हो इसे समझना आसान है।

कुछ इस तरह तमीज़दार हुए है जानम
के लोग कहते है मुझे तोड़ना आसान है।

अज़ीबो-गरीब महफ़िल है तेरी भी वर्मा
इस जगह तो सबका मरना आसान है।

नितेश वर्मा और आसान है।

मुझे वहीं रूक जाना था

मुझे वहीं रूक जाना था
उसकी निगाहों में
कुछ पल ठहरना था
उसकी निगाहों में
माँगनी थी कुछ ख्वाहिशातें
अर्जी भरनी थी एक रात की
पुकारना था उसे ज़रा जोर से
मग़र मैं लौट आया
ये सोचकर के.. के अकसर
अब तो.. यादों में
इसी गली से गुजरना है।

नितेश वर्मा

अरे यार इधर से जब भी गुजर गये

अरे यार इधर से जब भी गुजर गये
तुमसे मिले पहले फिर हम घर गये।

ऐसा नहीं है कि हम मौकापरस्त है
असलियत बाज़ारें हम भी कर गये।

चराग़ उसका आँगन में जलता रहा
रौशनी से हुआ जो अँधेरा डर गये।

बदल दो इसे भी हर बार की तरह
झूठी बातों से है जो लोग सुधर गये।

इश्क़ भी मनचलों की है आज वर्मा
शाइर भी मयखाने से जुबाँ भर गये।

नितेश वर्मा

यूं तो हर बात पर मुस्कुरानें की आदत है

यूं तो हर बात पर मुस्कुरानें की आदत है
हमें तो बस दिलों-जाँ लगाने की आदत है
शिकवे तो इस जुबाँ ने कभी किये ही नहीं
बस प्यार से गले लग जाने की आदत है।

नितेश वर्मा और आदत।

उस शख़्सियत का क्या कहिये जनाब

उस शख़्सियत का क्या कहिये जनाब
मोहब्बत की है तो अब सहिये जनाब।

उससे वफ़ादारी ही करनी है आपको
तो हमसे कुछ दूर आप रहिये जनाब।

हैंरा है रंगत सारी मिट्टी में मिल गई है
स्याह मिट्टी रंग अब तो बहिये जनाब।

ताउम्र कमरे और मकाँ में उलझे रहे
अब तो किसी घर आप होइये जनाब।

ना पूछिये किस कदर परेशान है वर्मा
दिल देकर यूं एक बार खोइये जनाब।

नितेश वर्मा और जनाब।

बड़ी मायूसी से गुजर रही थी ज़िन्दगी

बड़ी मायूसी से गुजर रही थी ज़िन्दगी
हमने देखा था बिखर रही थी ज़िन्दगी।

एक कोशिश तब भी की ही थी हमने
तब कहाँ पता था मर रही थी ज़िन्दगी।

बच्चे भी तमाम आजकल सियासी है
अपने ही वक़्त सुधर रही थी ज़िन्दगी।

हम भले ही नुकसान से गुजर जायेंगे
मगर बाज़ी ही नज़र रही थी ज़िन्दगी।

मुझे कोई भी फर्क नहीं पड़ता वर्मा
वैसे ही कब ये निखर रही थी ज़िन्दगी।

नितेश वर्मा और जिन्दगी