Monday, 5 August 2013

Alvida


चलो फिर ठीक है.. कल्ह मिलते है..
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देखोँ शाम हो गई.. उसके आने की वक्त..
आँखेँ को अब इजाजत नहीं कुछ और देखने को..
कहीं मुझे देख खोया तुझमें रुठ ना जाए..
और मनाने में जाए मेरी सारी रात बेकार..
हसरतें अपनी तुम मुझे कभी और बताना..
माना ऐ सुबह..! हो तुम मेरी जिंदगी..
तो वो भी मेरी मौत से कम नही..
इक..ना तो इक दिन मेरी हो ही जानी है उसे..!
अलविदा..

Tum Jab Soye Huye The


तुम जब सोये हुए यूँ ही थे मेरे सपनों मे कही..
धडकने मेरे थमे हुए थे यूँ ही तेरी बातों पे कही..
जज्बातें मेरे दबी हुए थे तेरे होठों पे यूँ ही कही..
तुम जब सोये हुए यूँ ही थे मेरे सपनों मे कही..
तेरे चेहरे पे मेरी नजरों का यूँ ही रुकना..
तेरी आँखोँ के घनी सायों मे यूँ ही कही खोना..
तेरा यूँ ही कही मुझसे मेरा होना..
साँसें तेरे भीँगे हुए मेरी आँखों के बरसातों से कही..
तुम तो डुबे हुए थे यूँ ही कही अपनी हालातो में..
मैं तो यूँ ही कही खोया रहा तेरी रातों मे..
तुम जब सोये हुए यूँ ही थे मेरे सपनों में कही..!

Tu Roya Meri Saher... Hui Aakhir Aisi Kya Khata..?


Tu Roya Meri Saher... Hui Aakhir Aisi Kya Khata..?
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Bata Mere Humdum Hui Aisi Kya Baat..? 
Jo Tu Royi Mere Kandhe Pe Sir Rakh Saari Raat..!

Aakhir Rakhha Hi Kya Hai..?


आखिर रक्खा ही क्या है मुझे तुम्हे बताने को..
चलों आज तुम्हें अवारें..ए..जिंदगी सुनाता हूँ..
तुम शायद वाखिब थे मुझसे.. मेरी आशिकी से..
रात..ए..जश्न कहीं और जमा रक्खा था..
हाथों मे जाम उल्फ़त के.. और लबों पे कातिल मुस्कान करके..
कायनात मेरी दिल पे जमा रक्खा था..
आई जो उस रात करीब मेरे तुम..
मेरी ख्वाहिशों ने अपनी आशियाँ संग तेरे जन्नत में सजा रक्खा था..
तू अचानक मेरी नजरों से दूर हो गया.. थाम के हाथ शायद अपने रकी़ब का..
मेरी हाथों मे इक बार फिर से सजा गए तुम..
किताब..ए..अवारगी हैवान का..
तड़पती गई.. तरसती गई.. आँखें मेरी..
तुमने अपना नज़र कहीं और जमा रक्खा था..
बसा लिया शायद तुमने मेरे नाम किसी और को..
मैंने तस्वीर को तुम्हारी अपने कमरों मे सजा रक्खा था..
क्या बताऊँ इक रात आया इल्जा़म सर मेरे..
मैंने उनका जीना हराम कर रक्खा है..
पैगाम आया अब तो दूर हो जाओ मेरी नजरों से तुम..
तुमने मेरा चलना हराम कर रक्खा है..
याँ खुदा! तुम्हे मौत भी रास आ जाए कभी..
नजरों के सामने मेरे उनका अरमां बिखरा रक्खा था..
हालातें देख मेरी.. परेशां रात मेरी..
अपने मे बसाने को हाथों सजाएँ मेरी ओर नजरें जमाएँ रक्खा था..
शायद..! कोई मुझे समझता नही..
इसलिए उस रात.. वो खिडकी से नजरें टिकाए मेरी..
मरने का इंतजार जमाएँ रक्खा था..!

Tum Khwaab Ho Mere Ab Tumse Kya Kahna..?


तुम भी इक दिन मेरी दीवानी हो जाओगी.. मेरी मौत की तरह..
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आज़कल परेशाँ ये मेरी जिंदगीं से लडा़ करती है.. मुझे अपना बनाने को..!

Hua Naam Ye Badnaam Shaher Aa Ke Tere...


Hua Naam Ye Badnaam Shaher Aa Ke Tere...
Hua Ye Dil Aashiq Tere Naam Tere Shaher Aa Ke..
Anjaan Main Shaher Aur Teri Baaton Se..
Hua Badnaam Ye Naam Tere Hone Ke Khatir..!

Bhar Gaya Hai Dil


Bhar Gaya Hai Dil.. Ho Gayi Hai Raat..
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Tum Jab Tak Samjhoge Beet Gayi Hogi Meri Puri Saans..!