Tuesday, 11 March 2014

..प्यार के नाम..

..इक सयाना सा लफ़्ज़ सीख आया हूँ..
..प्यार के नाम..
..मैं भी एक हर्फ़ सीख आया हूँ..
..कोई कोशिश ना होगी..
..अब तुझे भूलानें को.
..आँसूओं से फिर वही दोस्ती कर आया हूँ..!



Sunday, 9 March 2014

..हर लफ़्ज़ है शातिर..

..हर लफ़्ज़ है शातिर हर ज़ुबां है फरेबी..
..रात को यूं ही बदनाम कर रहे..
..अँधेंरों के खेले शातिर..
..कर रहे है हक की बात..
..रात को देख सबेरा की बात..
..गर अँधेरां ना हो तो ये अपराध ना हो..
..कोई रेप ना हो कोई भ्रष्टाचार ना हो..
..कर रहे है ऐसी सारी बकवास की बात..
..दिल को छुपा कहीं रिश्तों से कर रहे है प्यार..
..क्या है इनकी ज़ुबां की बात..
..हित से ज़्यादा कर रहे है अपनी बात..
..कोई ये मुशायरा नहीं जो इरशाद हो..
..शातिर है गर लफ़्ज़ मेरी तो कोई नयीं बात हो..
..रात में होती ज़ुर्म कम हो अपराध पे हाथ मेरी..
..बातों में गर दम हो तो रातों में खुशनुमां रग हो..
..यहीं है आरज़ू मेरी..
..जुबां पे एक रंग हो जो इश्क के रंग हो..
..जग हित में तुम्हारा साथ हो..
..और शातिर बस तुम्हारा ही नाम हो..!


..ख़ामोश ही रहने दो इन्हें तुम..

..इक लफ़्ज़ है मेरे इन्हें ख़ामोश ही रहने दो..
..ज़िक्र तेरा कर जाऐंगें तो हाथ से ये मेरे जाऐंगें..
..दिल को तेरे ये मेरे आरमां सुनाऐंगें..
..और दिल से मेरे निकल जाऐंगें..
..ख़ामोश ही रहने दो इन्हें तुम..
..दिल में ही रहने दो इन्हें तुम..
..लफ़्ज़ गर बाहर आऐंगें तो दिल क्या..
..साँसें भी हमारे रुह से अलग हो जाऐंगें..
..इक लफ़्ज़ है मेरे इन्हें ख़ामोश ही रहने दो..
..ज़िक्र तेरा कर जाऐंगें तो हाथ से ये मेरे जाऐंगें..!


Saturday, 8 March 2014

..नारीत्व क्या गुलाम का नाम है..

..नारीत्व क्या गुलाम का नाम है..
..पुरुष-प्रधान इस प्रदेश में..
..क्या ये बस जरूरत का नाम हैं..
..चूल्हें की आग में बिछावन की रात में..
..सयानों की बात में..
..क्या बस ये समाज़ की बकवास में है..
..सजने-सजानें में दर्द को छुपानें में..
..लोरी सुनानें में गमों को सीने से लगाने में..
..क्या बस जरूरत में ही याद आते है..
..मक्सद के खातिर ही बनायें जाते है..
..रिश्तों में बस सजाएँ जाते है..
..नारी को अपनाने के ख़िस्सें बस सुनाएँ जाते है..
..कैसी है चलन ये..
..समाज़ की भूख में तपाएँ जाते हैं..
..दर्द के आँसू में रुलाएँ जाते हैं..
..ज़माने के आग में झोंक के जलाएँ जाते हैं..
..सम्मान में बस दिखाएँ जाते हैं..
..पता ना जमाना अब कितना पीछें चला जा रहा हैं..
..नारी को समाज़ से हटाया जा रहा हैं..
..नारी हैं समाज़ की नींव..
..इन्हें किसी मक्सद से नहीं..
..अपने दिल से जोडों..
..मुहब्बत में एक लफ़्ज़ और नया जोडों..
..नारी-सम्मान को एक नई मक्सद से जोडों..!

Thursday, 6 March 2014

..सयानें है रिश्तें..

..लफ़्ज़ दर्द के मेरे खामोश ही रहने दो..
..सयानें है रिश्तें दर्द को दिल में ही रहने दो..
..समुन्दर सी बात हैं मेरी..
..ये रात को ऐसे ही रहने दो..
..मुहब्बत में है शिकस्त मेरी..
..मेरी जाँ को बस ऐसे ही परेशां रहने दो..
..लफ़्ज़ दर्द के मेरे खामोश ही रहने दो..
..सयानें है रिश्तें दर्द को दिल में ही रहने दो..
..बागों की बातों को रातों की सौगातों को..
..यूं ही राज़ ही रहने दो..
..दिल में मेरी अपनी वहीं पुरानी तस्वीर बसी रहने दो..
..ये ज़ुल्म की रात मेरे हर्श की बात..
..लफ़्ज़ों से अपने दूर ही रहने दो..
..मुहब्बत के साथी मेरे..
..ज़रा मुझे मेरी बातों में बने रहने दो..
..लफ़्ज़ दर्द के मेरे खामोश ही रहने दो..
..सयानें है रिश्तें दर्द को दिल में ही रहने दो..
..बारिशों बीच मुझे तन्हा भींगे रहने दो..
..हवाओं को मेरी ज़ुल्फ़ों से लगे रहने दो..
..दिल के मेरे ज़ज़्बातों को..
..सीने से ही लगे रहने दो..
..फ़रेब की मुहब्बत से मुझे दूर ही रहने दो..
..मेरी बातों को मेरी दिल से लगी रहने दो..
..लफ़्ज़ दर्द के मेरे खामोश ही रहने दो..
..सयानें है रिश्तें दर्द को दिल में ही रहने दो..
..रही कुछ ज़िन्दगी को मेरी..
..थोडा सुकून से बने रहने दो..
..रिश्तों में मेरे थोडा वज़ूद बने रहने दो..
..मुहब्बत में मेरे किए ज़ुर्म को..
..मेरे नाम से ही लगे रहने दो..
..लफ़्ज़ दर्द के मेरे खामोश ही रहने दो..
..सयानें है रिश्तें दर्द को दिल में ही रहने दो..!

..रक्त बाकी है..

..रक्त बाकी है वक्त बाकी है..
..मेरी लफ़्ज़ों पे एक हर्फ़ बाकी है..
..मिट जाऐंगे कभी..
..शायद लिखे मेरे नामों के पन्नें..
..कभी लेकिन ज़ुबां पे मेरी..
..अभी एक हर्फ़ बाकी है..
..कुछ रक्त बाकी है..
..सीने में एक दिल बाकी है..
..जुदा हो धडकन से तेरी..
..मुहब्बत आँखों में मेरी अभ्भी बाकी है..
..मुश्किल में है जाँ मेरी..
..मगर ज़ुबां पे नाम अभ्भी बाकी है..!


Saturday, 1 March 2014

..सारी कायनात..

..जो मिली थीं मुस्कुराहट मुझे ज़िन्दगी से..
..जो मिली थीं राहत मुझे ज़िन्दगी से..
..रात ए गम की चली..
..और ज़िन्दगी राख में मिल गयीं..
..खाख़ तो होना ही था एक दिन..
..ज़िन्दगी दुश्मनी की बारात से निकल गयीं..
..मुहब्बत जो मेरी..
..बेवफ़ा की दिल से होकर गुजरी..
..सारी कायनात..
..मेरी रात से होकर गुजर गयीं..!