Thursday, 1 January 2015

यूं, महज बुराई ही बुराई हैं इस जमानें में

यूं, महज बुराई ही बुराई हैं इस जमानें में
अब क्या यकीं करें किसी के अफसानें में

नसीबें तोडती थी, बंदिशें कभी लोगों की
अब तो लगे रहते हैं लोग यूं आजमानें में

कुसूर उसनें बताया था की मैं गलत रहा
तमाम उम्र गुजार दी उसनें ये बतानें में

मैं तो मुहब्बत के बहानों से बहोत दूर था
ना-जानें क्यूं ना समझी मेरे समझानें में

नितेश वर्मा


उस नजर की कोई ख्वाहिशें मिटती नहीं

उस नजर की कोई ख्वाहिशें मिटती नहीं
सवालें इतनी हैं की नुमाईशें मिटती नहीं

वो घर के अंदर भी गुम-सुम सी बैठी हैं
चेहरें पे सौ पहरें और बंदिशें मिटती नहीं

यूं तो बस अब उसका ख्याल ही काफी हैं
कहानियाँ हैं इतनी के रंजिशें मिटती नहीं

उसकी दर्दों का तो अब कोई मरहम नहीं
देखी हैं करके यूं ये गुजारिशें मिटती नहीं

नितेश वर्मा


कोई कहता हैं कुछ हिसाब अभ्भी हैं

महज दो पल और 100 से भी ज्यादा बच्चें मारें गए, कुसूर शायद वो बच्चें थें। आर्मी स्कूल पेशावर, पाकिस्तान, बच्चों को सुबह लाईन में खडा करके उनकें आँखों और चेहरें पे गोली मार दी गई। कहा जा रहा यह हमला तालिबान के एक संगठन तहरीक ए तालिबान ने करवाया था। इस ऑपरेशन में जिहादियों के परिवारों पर हमले होते हैं, उनके बच्चों को मारा जाता है। तालिबान ने कहा, 'हमने स्कूल को निशाना बनाया क्योंकि सेना हमारे परिवारों को निशाना बनाती है। हम चाहते हैं कि वे हमारा दर्द महसूस करें।'

[ कुछ बयान जो इस हमलें के बाद सामनें आएं: नव-भारत टाईम्स

मैं बड़ा होकर सभी आंतकवादियों को मार दूंगा। उन्होंने मेरे भाई को मार डाला। मैं उन्हें बख्शूंगा नहीं, एक-एक को मार डालूंगा। - एक घायल बच्चा

जो बच्चे अब तक रो और चिल्ला रहे थे, मैंने देखा कि वे एक-एक कर गिरने लगे। मैं भी गिर गया। मुझे बाद में पता चला कि मुझे गोली लगी है - एक घायल बच्चा

मेरा बेटा सुबह यूनिफॉर्म में था, अब ताबूत में है। मेरा बेटा मेरा ख्वाब था। मेरा ख्वाब मारा गया। - ताहिर अली, मारे गए बच्चे के पिता ]

इस हमले की एक वजह पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को मिला नोबेल पुरस्कार भी मानी जा रही है। पाकिस्तान के जानेमाने पत्रकार हामिद मीर ने एक भारतीय न्यूज चैनल से बातचीत में कहा कि मलाला को जब नोबेल प्राइज मिला, तब तालिबान ने ऐसा हमला करने की धमकी दी थी, इसलिए संभव है कि स्कूल को निशाना बनाकर शिक्षा का विरोध करने का संकेत दिया जा रहा हो।

वजह चाहें जो भी हो गर किसी देश को किसी दूसरें देश से बदला लेना हैं तो सीमा पे बैठें उन सैनिकों से लें, जो उनके मेहमान-नवाजी के लिए हमेशा तैयार रहतें हैं। बच्चों से, महिलाओं से या किसी बुजुर्ग से किस बात का बदला? उन्हें मार के कौन सा सियासत उनके हाथ आ जाऐगा। किसी देश के लिए इससे तुक्ष्य बात और क्या हो सकती हैं वो अपनें बदलें स्कूल के बच्चों से ले रहें हैं। वो बच्चें जो कल के भविष्य हैं, आज के रौशन हैं, उम्मीदें हैं। मैं खुद शर्मिंदा हूँ जो आज मैं यह दिन देख रहा हूँ। सियासी ना जानें कहाँ तक कौम को ले जाऐगी। वक्त और ना-जानें क्या-क्या दिखाऐगा। हम उन बच्चों और उनके परिवार वालों के लिए कामना करतें हैं भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।

यूं तो बदलें की बची आग अभ्भी हैं
सीनें में उसके ये खंज़र तो अभ्भी हैं

कोई कहता हैं कुछ हिसाब अभ्भी हैं
तभी तो शहर में लगी आग अभ्भी हैं

नितेश वर्मा



मिलती जो खबर उसकी तो बेखबर ना होतें हम

मिलती जो खबर उसकी तो बेखबर ना होतें हम
साथ गर वो होती मेरी तो यूं बेसबर ना होतें हम

बारिशों में यूं ही वो चली आई थीं भींगतें भींगतें
मौसमों का होता हिसाब तो बेकबर ना होतें हम

कितनी आरज़ूओं को दबाएँ बैठा हैं ये दिल मेरा
होती जो उसकी रात तो यूं दरबदर ना होतें हम

उनकी दुआओं का ख्याल हैं ये उम्मीदें मेरी तो
वर्ना यूं इस असर के तो वो बेअसर ना होतें हम

नितेश वर्मा


यूं तो ये उम्मीदें बेकरार अभ्भी हैं

यूं तो ये उम्मीदें बेकरार अभ्भी हैं
मुझमें तो बची इक जान अभ्भी हैं

पता पूछतें हो तुम उस शायर का
लगता हैं बचा कुछ शे'र अभ्भी हैं

यूं मुहब्बतों का शोर हैं वीरानों में
शायद बचा यूं कुछ राज़ अभ्भी हैं

मेरी नजर से ना देखों तुम ऐ वर्मा
तुममें तो बची कुछ बात अभ्भी हैं

नितेश वर्मा


मुहब्बत भरी इक जज्बात कहनें आया हैं

यूं वो मुझसे अब इक बात कहनें आया हैं
मुहब्बत भरी इक जज्बात कहनें आया हैं

सुना था उसके बारें में ना-जानें क्या क्या
वो मुझे आज ये ज़िंदा रात कहनें आया हैं

इन ठंडी-थमी हवाओं का असर हैं शायद
वर्ना कौन अब ये बरसात कहनें आया हैं

कितनी तकलीफ से वो आया हैं मुझतक
ख्वाबों में आज वो हयात कहनें आया हैं

नितेश वर्मा

लो हार गया मैं आके आगे फिर से,उसकी ज़िद से

फिर से वही इक नाकाम कोशिश, उसकी ज़िद से
लो हार गया मैं आके आगे फिर से,उसकी ज़िद से

बता रही थीं वो भरी महफिल में यूं मुहब्बत मुझे
हो गया मैं रौशन बिखर के तन्हा, उसकी ज़िद से

बेखबर वो इस खबर से,ज़िंदा हैं इक लाश कब्र पे
क्यूं हो जाता हूँ मैं बेबस अक्सर, उसकी ज़िद से

नितेश वर्मा