Wednesday, 1 July 2015

मजहब मेरा मुझे यही सिखाता रहा है

हर दर पर जाकर ये सर झुक जाता है
मजहब मेरा मुझे यही सिखाता रहा है।

नितेश वर्मा

बदनाम शहर का बदनाम शख्स हूँ मैं वर्मा

कोई किसी को यूं कहाँ तक याद रखता है
अब नहीं दिल मेरा कोई जज्बात रखता है।

वो जो यूं टूटता हैं तो दिल से भी टूट जाये
आईना भी टूट के कहाँ कुछ साथ रखता है।

उसको भी बिछड़ के कहाँ एक पल सुकूं है
फिर क्यूं वो साथ अपने आफताब रखता है।

अब तो वो अपनी जां तक कुर्बां करने को है
फिर जुबां क्यूं उसे यूं ही गिरफ्तार रखता है।


बदनाम शहर का बदनाम शख्स हूँ मैं वर्मा
मगर फिर भी होना मेरा कुछ बात रखता है।

नितेश वर्मा

किस फिक्र में जी रहे है जिन्दगी वर्मा

अब तो शर्मिंदगी इस बात को लेकर है
जानें नाराज वो किस बात को लेकर है।

ना जाने वो ऐसे क्यूं परेशां रहने लगी है
अब हर आवाज़ इस बात को लेकर है।

हर दो कदम के बाद वो मुकर जाता है
दिल ये हैंरां बस इस बात को लेकर है।

किस फिक्र में जी रहे है जिन्दगी वर्मा
मौत भी इंतजार इस बात को लेकर है।

नितेश वर्मा

अपनी सारी ख्वाहिशों को एक दिन खरीद लूंगा

अपनी सारी ख्वाहिशों को एक दिन खरीद लूंगा
जिस दिन जिंदगी-गरीबीयत से रिहा हो जाऊंगा।

नितेश वर्मा और एक दिन

वर्मा अजीब ये सरकारी बीमारी हुआ

जनहित में तो बहोत कुछ जारी हुआ
वर्मा अजीब ये सरकारी बीमारी हुआ

अबके जो मेरे साथ जला दिया जायेगा
ता-उम्र बस यहीं इक खरीददारी हुआ

तो खून खौलता है उसका हर बात पे
कोई बताएं ये कैसा समझदारी हुआ

इस चार-दीवारी से घुटन हैं मुझे वर्मा
निगाहें देख उसे मुझे ये लाचारी हुआ

अब तो रस्ते बदल के है सजदा किया
कोई न कहें कैसे रोजा-अफ्तारी हुआ

नितेश वर्मा

जहाँ तक हो ये आवाज़ कर दो

जहाँ तक हो ये आवाज़ कर दो
सर हमारे भी इक ताज़ कर दो

किस साहिबेमसनद को बताएं
गूंगेबहरी वाली सामाज़ कर दो

हम ही इक मालिक है यहाँ के
इसे इश्तेहार तुम आज कर दो

कितना कुछ मुझमें वो छोड़ गई
बस उन्हें मुझमें इक राज़ कर दो

नितेश वर्मा

मरके भी वो रो रहा घर जमीन था कितना

बिछड़ के फिर मिलेंगे यकीन था कितना
ख्वाब तो था ही लेकिन हसीन था कितना।

मैं उसकी उलझनों से रिहा होनें लगा था
मगर वो जुल्फ उसका ज़रीन था कितना।

थोड़ा करीब उसे सीनें से लगाकें रखा था
नज़र यूं मुझपे सबका गमगीन था कितना।

कौन कहता हैं एक दिन सब भूल जाने है
मरके भी वो रो रहा घर जमीन था कितना।

इंसानों का इंसानियत से है नाता टूट चुका
वर्मा उन शब आँखों में तौहीन था कितना।

नितेश वर्मा