Wednesday, 12 October 2016

हिंदी दिवस Hindi Diwas By Nitesh Verma Poetry

#हिंदीदिवस

अग़र वीराने-ख़्वाब से रिहा हो चुके हैं तो हिंदी दिवस की ओर ग़ौर फ़रमा ले। ये बाहें खोलें आपका इंतज़ार कर रही है। भावुकता से उठाने या थामने की ज़रूरत नहीं है और ना ही अश्रुपूर्ण दो-चार कविताओं को परोसने की। हिंदी को आपसे बस मुहब्बत की जरूरत है वो थोड़ी सी भी हो तो चलेगी।
हिंदी में अँग्रेज़ी का प्रयोग हिंदी के ठेकेदारों को ग़लत लग सकता है लेकिन आप अग़र इसके साथ Comfortable है तो ज़रूर ऐसा कीजिये। सबकुछ सबके मुताबिक़ नहीं होता। हिंदी अपनाइये बग़ैर शर्त या किसी शर्त के वो आप पर निर्भर करता है। सवाल उठाने वाले तो कई दिग़ज्जों पर सवाल उठा चुके हैं। दुष्यंत कुमार जी के शे'र-
तू किसी रेल सी गुजरती है
मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ।
पर भी सवाल उठाया गया है कि रेल हिंदी या उर्दू नहीं बल्कि अँग्रेज़ी का शब्द है उन्हें ऐसा शे'र नहीं कहना चाहिये था।
फ़ैज अहमद फ़ैज साहब ने "हिंदी में अँग्रेज़ी का आगमन"- पर बहुत ही बेहतरीन तरीके से एक बात समझायी है।
शब्द अँग्रेज़ी का है Bore यानी कि उबन। इस Bore से हिंदी के ठेकेदारों को कई परेशानी रही है। मग़र आज देखिये हर कोई अपने लिखावट में बोरियत शब्द का इस्तेमाल नि:संकोच करता है उसे उर्दू का बताकर।
नयी शब्दों का आगमन भी ज़रूरी है। मग़र हिंदी की बनी-बनायी दुनिया इसे रत्तीभर भी अमल में नहीं लेती है। सोचिये अग़र मशहूर गीतकार शैलेंद्र जी- ज़िंदगी से ज़िंदगानी का ईज़ाद ना करते तो क्या आज के कई शे'र इतने खूबसूरत हो सकते थे?
हिंदी अपनाइये, हिंदी बढ़ाइये, नये शब्द बनते हैं तो उन्हें सराहिये। ज़्यादा और कुछ लिखने से अच्छा है एक कविता पढ़ लीजिये शायद विचार हमसाथ हो जाये।

विश्व इतिहास में जब एक पुस्तक धाराशायी थी
और मंत्र फ़ूँकते हुये कुछ तांत्रिक
तब रटे जा रहे थे हिंदी.. हिंदी.. हिंदी..
अग्नि की लपटें तीन सौ ग़ज ऊपर उठीं थी
बस्तियाँ जब जल रही थी.. लोग झुलस रहे थे
तांत्रिक पसीने से तर-ब-तर होकर
जब एकसुरी अश्रुपूर्णित मंत्र पढ़े जा रहे थे
हिंदी भीषण जगाये जा रहे थे दिलों में सबके
के यकायक आकाशवाणी हुयी और
सब थर्रा गये-
ऐ! मूर्ख हिंदी जलाकर हिंदी बचा रहे हो?
अब समेटते रहो पीढ़ियों दर पीढ़ियाँ
हिंदी बहुत वक़्त लेगी फ़िर से लौट के आने में
मनाओ हिंदी दिवस और कोसों ख़ुदको
हिंदी तैरती आकाश में कहीं दूर जा रही थी
और सब हिंदी अर्थी ठेकेदार हाथ जोड़े
Oh! My god कह रहे थे।

नितेश वर्मा

#Niteshvermapoetry #HindiDiwas2016

ख़ुद्दारी उतारकर फ़ेंक ही दी हमने आख़िर में

ख़ुद्दारी उतारकर फ़ेंक ही दी हमने आख़िर में
सवाल जब उठा हुआ था सबके ही ख़ातिर में।

जब तलक धुंध कमरे में थी वो लिपटी रही थी
कमाल हुआ ख़्वाबें जली आके यूं धूप सिर में।

उस ग़ज़ल का मक़ता ही उन्हें पसन्द नहीं था
ख़ाक समझेंगे वो शे'र हुस्ने-मिसरा ज़ाहिर में।

मैं मुतमैयन भी नहीं ना ही तग़ाफुल करता हूँ
सब इल्म भूल आया हूँ दास्तान-ए-साहिर में।

दीवारें सटी हुई हैं पर दिलों में फ़ासले हैं वर्मा
अपने भी आज बहुत खड़े हुये हैं मुहाज़िर में।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

अँधेरे में जो तुम ही जलकर सामने आ जाती

अँधेरे में जो तुम ही जलकर सामने आ जाती
सच्चाई सब वहीं निकलकर सामने आ जाती।

जब भी कभी थोड़ा तल्ख़ होना चाहता था मैं
इक सूरत हसीन पिघलकर सामने आ जाती।

ये दरम्यान नजाने क्या बचा था दरोदीवार के
परछाइयाँ ख़ुदसे लिपटकर सामने आ जाती।

तकलीफ़ तुम्हारे वापस लौटके आने की नहीं
बस कभी ये मौजूँ बदलकर सामने आ जाती।

बहुत तन्हा महसूस किया था मैंने ख़ुदको तब
जब शामें मुझमें ही ढ़लकर सामने आ जाती।

हुस्न दरिया था उसका पर थी सराब में ज़िन्दा
प्यासी थी तो वहीं मचलकर सामने आ जाती।

दमपुख़्त फ़िरसे ख़ुदको किये है हम भी वर्मा
वो सलीका नहीं के घुलकर सामने आ जाती।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

यूं ठुकराया जाना किसे पसंद होता है

यूं ठुकराया जाना किसे पसंद होता है
ख़तों के सिलसिले के दरम्यान
चयनकर्ताओं से अपनी पहचान
बाज़ारों के बीच पुरानी सी दुकान
बची हुई झूठी सी अपनी शान
मंज़ूर नहीं होता है किसी को
यूं बेवज़ह का ठुकराया जाना
लेकिन फ़िर हवा उठती है इक
कोई लहर भी आता है अज़ीबोग़रीब
और फिर वक़्त बदलता है
इंसान भी बदलते हैं कई शक्ल लेकर
और रिवाज़ चल पड़ता है फ़िर से
बदले की, द्वेष की, स्वतंत्रता की
स्वाधीनता की और आंदोलनों की
फ़िर लाज़िम होता है ठुकराया जाना
प्रेमी मुहब्बत ठुकरा देता है
निज़ाम मुल्क को
अफ़सानानिगार साहित्य को
क़िताब-ए-हर्फ़ मानी को
बादल बारिश ठुकरा देते हैं
पेड़ पत्तों को
दोस्त सोहबत को
और धर्म कर्तव्य को
और फ़िर जारी रहता हैं यहाँ
अनादिकाल तक ठुकराया जाना
पर सोचिये ख़ुदको उदाहरण लेकर
यूं ठुकराया जाना किसे पसंद होता है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

आइये इक और क़त्ल करते है

आइये इक और क़त्ल करते है
थोड़ा बुरा और शक्ल करते है।

उसकी शाम रोशन कैसे रहेगी
चलो कुछ और दख़्ल करते है।

देखकर उस शाख की दरख़्त
कुछेक हम भी नक्ल करते है।

हमारा वजूद भी मिट्टी में मिला
हमीं बयां हाले-दिल करते है।

के दावेदार भी बहुत है यूं वर्मा
जो मुझे ही बद्शक्ल करते है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

तेरे ही जिस्म को ओढ़ता हूँ मैं

तेरे ही जिस्म को ओढ़ता हूँ मैं
जब-जब सर्दियाँ मुझमें बनती है
तुझमें ही तो डूब जाता हूँ मैं
जब-जब गर्मियाँ मुझमें उतरती है
मैं हूँ इक धूप.. तू हवा सी है
तू चलती है तो मैं चलता हूँ
तेरे ही होने से है ये सब मुझमें
ख़यालों की काग़ज पे तू ही उभरती है
तेरे ही जिस्म को ओढ़ता हूँ मैं
जब-जब सर्दियाँ मुझमें बनती है।

नितेश वर्मा
#Niteshvermapoetry

ये इश्क़ वादे भी हज़ार करता है

ये इश्क़ वादे भी हज़ार करता है
कमबख़्त! ऐसे ये प्यार करता है।

कइयों मानी में जब्त हुआ था जो
वो शे'र मुझे असरदार करता है।

तन्हाई में कई बार ख़याल आया
मेरा ज़िस्म भी व्यापार करता है।

जब डूबने लगी तमाम ख़्वाहिशे
लगा दिल कुछ उधार करता है।

करवटें लेती रहीं थी सिसकियाँ
ख़बर तो खड़ा दीवार करता है।

वो मुझमें मुद्दा उठाता है हरबार
वही ख़ुदको अखबार करता है।

जो उलझते रहे थे हम ख़ुदसे ही
इसपे ही वो जाँनिसार करता है।

था कोई ये हक़ीकत का क़िस्सा
इल्म ख़ूब हो तकरार करता है।

जब भी गुजरता हूँ मैं तिरगी से
वो आके मुझे गुलज़ार करता है।

उल्फ़त की गर्मी ऐसी लगी वर्मा
देखा इश्क़ भी बीमार करता है।

नितेश वर्मा

#Niteshvermapoetry