Tuesday, 27 January 2015

लो इक यकीं कर लो हमारा भी तुम

लो इक यकीं कर लो हमारा भी तुम
सर इक खून कर लो हमारा भी तुम

किसी और से कहाँ-तक जताएँ हम
रिश्ता कोई भी करो हमारा भी तुम

क्यूं पूछती उसकी निगाहें तो ना हैं
सवाल उससे करो ये हमारा भी तुम

इक तुम ही नहीं हो सियासती यहाँ
चाल बदलके ये करो हमारा भी तुम

नितेश वर्मा


इन आँखों से नजानें बूंदे कब-तक बरसती रही

इन आँखों से नजानें बूंदे कब-तक बरसती रही
पूछा तो कही खातिर ये तुझ-तक तरसती रही

सौ दिनों का प्यासा परिंदा यूं ही भटकता रहा
और घनी बादल उसके मरने-तक गरजती रही

क्यूं सियासत-बंदी अब दुकानों में बंद हो गयी
साँसें भी अब बातों पर आने-तक मुकरती रही

वो ख्वाबों का सपना दिखा के कब का गया हैं
और बैठी पगली दीवानी अब-तक संवरती रही

नितेश वर्मा

तुमसे ही कुछ ये ज़िन्दगी हैं

तुमसे ही कुछ ये ज़िन्दगी हैं
तुमसे ही ये रास्तें ये मंज़िले
तुमसे ही
ये जीनें की ख्वाहिश हैं
और
तुम-तक ही ठहरनें की गुजारिश
ये जुबां हैं गर बेजुबां
तो बेजुबां ही सही
दिल हैं ठहरा तुमपें
तो तुम-तक ही चाह हैं
तुमसे ही कुछ ये ज़िन्दगी हैं
तुमसे ही ये रास्तें ये मंज़िले

नितेश वर्मा

मैं तो यूं अभ्भी नाखुश उसके इरादें से हूँ

मैं तो यूं अभ्भी नाखुश उसके इरादें से हूँ
बयान मैं करता क्या के उसके इरादें से हूँ

था तो यूं नजानें मैं कितनी मुश्किलातों में
लो जो मरा मैं तो ये सब उसके इरादें से हूँ

कोई कहता हैं क्या मुझे इसकी कहाँ हैं पडी
लिखता-सुनता मैं शख्स उसके इरादें से हूँ

अब तो भरम उसके आँखों में ही कही होगा
मैं तो बेजान सब ये जान उसके इरादें से हूँ

नितेश वर्मा

ग़र रूठता हैं तो वो रूठ जायें हमें ये होश कहाँ

कोई छूटता हैं तो छूट जायें हमें कोई होश कहाँ
ग़र रूठता हैं तो वो रूठ जायें हमें ये होश कहाँ

उसे मनानें अब हम निकलें भी तो क्या निकलें
नजर झुका के हैं बैठा मेरा होना उसे होश कहाँ

ये झूठ मान वो दरहो-हरम की दीवारें हैं तकता
के किसी रोज़ ख़ुदा मिलेंगे आँखें हैं बेहोश कहाँ

उम्मीदें-कसक,बुजदिली-आवारगी क्या क्या हैं
ले जायें ये किस मोड मुझे अब कोई होश कहाँ

नितेश वर्मा


Tuesday, 20 January 2015

सफर ये तन्हा कुछ हिसाब तो रखिएं

सफर ये तन्हा कुछ हिसाब तो रखिएं
बातें बडी-बडी,कुछ किताब तो रखिएं

वो तो मिलें आएं भी हैं यूं ना-गैरत से
उनसे कहिएं,कुछ बेहिसाब तो रखिएं

इन काली रातों में अब रक्खा क्या हैं
घर आपका,कुछ आफताब तो रखिएं

मुझसे बडे बेरूख हो चलें रिश्तें उनके
उन्हे छोडियें,कुछ बकवास तो रखिएं

अब तो यकीन उन्हें ज़मानें का ही हैं
मुझे छोडियें,कुछ मेहताब तो रखिएं

नितेश वर्मा

अब जब तुम ही ना रहें तो यूं करें कोई बात क्या

अब जब तुम ही ना रहें तो यूं करें कोई बात क्या
कैसी मुलाकात, कैसी साथ, और बीती रात क्या

अब तो, यूं किसी के बाहों के घेरों में ना होगें हम
इक मुक्कमल किताब हैं, हमारी कोई जात क्या

अब तो, इन पिंज़रें में दफन साँसों के समुन्दर हैं
जंगलों में जैसे बची नहीं रही अब कोई पात क्या

ता-उम्र जिसनें खुद को लूटा दिया हों यूं सरेआम
पूछतें हो आकर, तुम्हारी ही हुई थीं वो मात क्या

वो अभ्भी बेजुबां हैं, यकीं करों उसके आँखों पे तो
होती ग़र खुली जुबां तो सहता तुम्हारी लात क्या

नितेश वर्मा