Thursday, 3 April 2014

..दर्द दिलों से मेरे कम हो जाते..

..आँखों से तेरे सनम हम जुड जाते..
..मुहब्बत में शातिर सनम हम कर जाते..
..दर्द दिलों से मेरे कम हो जाते..
..गर सीनें में जो तुम मेरे बस जाते..
..सारें दिल के बैठे ये भ्रम टूट जाते..
..गर बातों में मेरे सनम तुम बस जाते..
..उल्फ़त में राहत तुम कर जाते..
..गर साँसों से तेरे हम बँध जाते..
..दर्द दिलों से मेरे कम हो जाते..
..गर सीनें में जो तुम मेरे बस जाते..!


Nitesh Verma Poetry

..क्या हुआ जो मैं नासमझ निकल गया..
..गर सयाना भी होता तो तेरा ही होता..!

..दिल खुश हो जाता हैं बस तेरे एक ज़िक्र से..
..गर तु पास होता तो क्या होता..!

..बेबकूफ़ बनाया गया हूँ या बना फ़िरता हूँ..
..आशिकी में तेरे ये मैं क्या किए फ़िरता हूँ..!

..अब नासमझ ही होना सही हैं..
..सयानों पे ज़ुर्म कुछ ज़्यादा ही हुआ करता हैं..!


..दिल भरें बाज़ार उतरें..

..सुना था दिल एक बाज़ार..
..सौदागर ये ज़माना है..
..अच्छी कीमत मिल ज़ाऐगी..
..मुझे मेरे तकदीर से..
..सोच मैं ये भरें बाज़ार उतरा..
..किश्तों में लूटा सबनें मुझे..
..तब आकर ये समझ आया..
..दिल भरें बाज़ार उतरें..
..तो टूट ही जाता हैं..!


Nitesh Verma Poetry

[1] ..रूठ गया हूँ मैं इस ज़मानें से..
..मनानें को शायद मुझे अब ज़मींदार आए..
..मैं ना मानूगाँ तब-तक..
..जब-तक हर्ज़ाना भरनें मेरे राम ना आए..

[2] ..मेरी मौत ने कहा मुझसे..
..कोई बहाना अब स्वीकार नहीं वर्मा..
..अब उबरने को जी चाहता हैं..
..ये उबन भरी ज़िन्दगी से..!

[3] ..और कुछ सुनाता मैं..
..इससे पहले वो बोल उठें..
..ज़ाना नाम ना लेना मेरा..
..वर्ना महफ़िल ये रो पडेगी..!

[4] ..हाथों में हाथ दे वो फ़रेब कर गया..
..पता ना गले लगाया होता तो क्या होता वर्मा..!


Wednesday, 2 April 2014

..राम और रहीम फ़र्क कर सहज़ हो गयी..

..पहल जो हुई थी अब हलचल हो गयी..
..नाम मज़हब की अब सरल हो गयी..
..कैसे लेना हैं मत अपने हक में..
..राम और रहीम फ़र्क कर सहज़ हो गयी..
..आक्रोश,आगोश और क्रांति..
..सारें ये चुनावी मतदान के पहलूं हो गए..
..हम बैठे रहें और नाम क्रांतिकारी हो गए..
..ज़ीतना हैं मुझे खुद को हरा..
..ये बात अब आम हो गयी..
..मैं हूँ तुम्हारें देश का स्वरूप..
...वादा करने वाले अनेक हो गए..
..चेहरें पहचानना अब मुश्किल हो गया..
..ख़ता ये कर दिया..
..जो ये सियासी बात समझ गया..
..लिखना था इंसाफ़ राज़ मिला देख..
..ये फ़रेब कर गया..
..हक में हैं क्या मेरे..
..मैं सोच ये खामोश हो गया..!


Nitesh Verma Poetry

[1] ..मैं सुनाता रहा तुम सुनते रहें..
..गज़ल को सम्मान इसी तरह मिलते रहे..
..और एक दिन तुम मुझसे बेरूख हो गए..
..मैं समझाता रह गया..
..और तुम उल्झतें रह गए..!

[2] ..सारी बातों को हमने किनारे कर दिया..
..तुम्हारा नाम उठाया और गुलामी कर दिया..
..इस तरह इज़हार कर रहा था मैं अपनी मुहब्बत..
..तुमने नज़र उठाया और हमे कातिल कर दिया..


[3] ..रोज़ सुनाता मैं अपनी नाराज़गी की दास्तां..
..तुमने गले लगाया और खामोश करा दिया..!

[4] ..अब हर्श की बात कौन करेगा वर्मा..
..मुहब्बत जो वो कर बैठा हैं..!


Tuesday, 1 April 2014

..जीता हूँ मगर हैरां हूँ मैं..

..जीता हूँ मगर हैरां हूँ मैं..
..हरायां हूँ किसे जो जीता हूँ मैं..
..कहीं खुद पे बाज़ी तो नहीं खेल आया..
..जो परेशां सा हूँ मैं..
..जीता हूँ मगर हैरां हूँ मैं..
..ज़िन्दगी के दर्द से परेशां सा हूँ मैं..
..सितम रब ने भी अब बढा दिया हैं..
..इस ज़िन्दगी से परेशां सा हूँ..!