Friday, 9 May 2014

..मैं वो इंसा हूँ जो दिल में सिकन्दर लिए चलता हूँ..

..दर्द का समुन्दर लिए चलता हूँ..
..मैं वो इंसा हूँ जो दिल में सिकन्दर लिए चलता हूँ..

..शहरें दिल की जब बात आती हैं..
..मैं सियासत में हूँ फ़िर भी सरेआम निकल चलता हूँ..

..वो सताया हैं किसी गम का..
..मेरे हिस्सें से मैं एक किताब लिए चलता हूँ..

..किसी मोड मिल जाएं ख़रीदार मेरा..
..चेहरें पे मैं मुस्कान लिए चलता हूँ..

..और कुछ बताना हैं इस आवाम को..
..खाली हाथ मैं भरें-रात निकल पडता हूँ..

..किसी और का सताया होगा वो..
..ज़ुर्म सारें हिन्दुस्तां के सर लिए चलता हूँ..

..मैं थकना चाहता नहीं मैं ये बात कहना चाहता हूँ..
..तुम खूब खर्च करों मेरे यार मैं तुमसे मुकर जाना चाहता नहीं..

..अब क्या सँभालेगी दर्द की दास्तां मुझे..
..मैं सियासत से बगावत किए चलता हूँ..

..दर्द का समुन्दर लिए चलता हूँ..
..मैं वो इंसा हूँ जो दिल में सिकन्दर लिए चलता हूँ..!


Thursday, 8 May 2014

..निकालों मेरा दिल और अपना इनाम ले जाओ..

..इस अँधेरें से एक चिराग ले जाओ..
..जो बचा हैं मेरा हिस्सा मेरे हाथ दे जाओ..

..अब नहीं हैं जताना मुझे आशिकी तुमसे..
..निकालों मेरा दिल और अपना इनाम ले जाओ..

..बहोत जी लिया तुमनें मेरें कंधों के सहारें..
..होंठों पे मेरे पडे लफ़्ज़ को किनारें कर जाओ..

..मेरे हिस्सें में पडी हैं धूप..
..ज़ुल्फ़ें बिखेरों और आसमान कर जाओं..

..अब इन्तहां कर दी तुमनें इम्ताह की..
..सपनों में आके मेरे मुझे बर्बाद कर दी..

..अब सबर नहीं होता मेरी जान..
..मानों तो मेरी मेरे हिस्सें से ये रात ले जाओं..

..इस अँधेरें से एक चिराग ले जाओ..
..जो बचा हैं मेरा हिस्सा मेरे हाथ दे जाओ..!


Wednesday, 7 May 2014

..मौत नें चैंन से मुझे कभी बुलाया नहीं..

..एक वक्त से उसने मुझे बुलाया नहीं..
..जो था लम्हा उसका..
..उसने मुझे अपना बनाया नहीं..

..यादों में मुझे अपने बसाती हैं..
..जो मुहब्बत था दिल से कभी जताया नहीं..

..याद आ जाता था..
..शाम की काँफ़ी की तरह मैं अक्सर..
..उसने मुझे कभी दिल से भूलाया नहीं..

..रहमों-दरम मिलतें हर ज़र्रें में मेरे..
..चेहरें को छू के कभी उसने बताया नहीं..

..एक अरसां सा हो गया हैं..
..वो देर से ही सहीं मुझे देख कभी मुस्कुरायां नहीं..

..अब लम्हात हमारें कटतें नहीं..
..मौत को दावां दिया एक अरसां हो गया हैं..

..अब बेचैंनी ही बची हैं इस ज़िन्दगी में..
..मौत नें चैंन से मुझे कभी बुलाया नहीं..!


Monday, 5 May 2014

..कभी धूप मेरे हिस्सें भारी पडी कभी पानी..

..रेंत से समुन्दर का सफ़र तय किया हैं..
..जो भी किया हैं खुद से किया हैं..

..कभी धूप मेरे हिस्सें भारी पडी कभी पानी..
..मैंनें खतरों से ये ज़िन्दगी तय किया हैं..

..हर रोज़  जलाता था जो मैं दीया..
..आँखों से अपनें बुझा दिया हैं..

..तेरे नाम से जो रौशनी बनती थीं..
..वो अँधेरों से छूपा दिया हैं..

..अब मत कर मुझे अपनें हवालें..
..ज़िन्दगी को मैंनें मौत से मिला दिया हैं..

..तू बेसबर हैं मेरे हौसलों की तरह..
..मैंनें चेहरें को तेरे सपनों से मिला दिया हैं..

..मैंनें दिल से तुझे अब ठुकरा दिया हैं..
..शायरी से मैंनें ये सबको समझा दिया हैं..

..अब ख़ामोश ही रहना तुम मेरे मामलों में..
..मैंनें ज़िन्दगी से तुम्हें अपनी निकाल दिया हैं..!


Friday, 2 May 2014

..मेरे मरने के बाद मुझपे आसमान गिरा देना..

..मेरे मरने के बाद मुझपे आसमान गिरा देना..
..चाहें रोना खूब..
..मगर आँखों से मेरी तस्वीर गिरा देना..!

..अब कसम ना देना मुझे अपनी सोहबत की..
..मौत देना लेकिन कोई यार मत गिरा देना..!

..जुदा होना ही किस्सा होता हैं..
..मगर अगर पहलूं में तेरा आँचल हो..
..तो जीना ही अच्छा होता हैं..!

..सारें करम गिनाएँ जातें हैं..
..जब ख़ुदा के पास हमें बुलाएँ जाते हैं..!

..हम तेरे पहलूं में ही जी लेते..
..आँचल फ़ैला के तुमनें बेइमान बना दिया..!


Thursday, 1 May 2014

Nitesh Verma Poetry

[1] ..मैं मासूम वो सयाना हैं..
..दिल में हैं मेरे दर्द..
..लेकिन लफ़्ज़ों से उसे चुराना हैं..

..सून लेगा वो तो कयामत हो जाऐगी..
..आँखों से आँसू मेरे यूं ही बह जाऐगी..

..याद करने की उसे अब जरूरत नहीं..
..भगोडी मुहब्बत यूं ही मेरी चलती जाऐगी..!

[2] ..दफ़न करके रक्खा हैं सबने..
..दिल में ना जाने क्या बात..
..फ़ेर दो जो हाथ तो आँखें नम हो जाती हैं..!

[3] ..शिकवा हैं शिकायत हैं..
..तुमसे की जो मुहब्बत..
..तो हुई एक बगावत हैं..

..अब नाम लेने का दिल नहीं होता..
..साँसों पे मेरे जो हुई तेरी सियासत हैं..!

[4] ..अब तल्ख़ भारी हैं नाम में मेरे क्या रक्खा हैं..
..जादूई ये राज़नीति हैं अब वक्त में क्या रक्खा हैं..!


..मुहब्बत इक पैगाम हैं..

..मुहब्बत इक पैगाम हैं..
..जिससे हुई बात आज़ आम हैं..

..खबरें बनानें को ये मंज़र बनी हैं..
..चेहरें पे बनी शर्म हुई आज़ काम हैं..

..ये मुहब्बत..
..ज़िन्दगी को हरानें की रस्सी बनी हैं..
..दिल से मुझे गिरानें की मकसद बनी हैं..

..सूरत तेरी अब मैली हो गई हैं मेरी लैला..
..आँखों में मेरे..
..बसी तस्वीर तेरी कुछ धूँधली सी पडी हैं..

..सितम दिल पे मेरे तेरे अब हैं भारी पडे..
..मासूम ज़िन्दगी..
..मेरी अब लूट के रह गयीं हैं..

..मुहब्बत में हैं जो दर्द "अए वर्मा"..
..वो लफ़्ज़ों में बस के रह गयी हैं..!