Wednesday, 11 March 2015

आवाजें कुछ कहनें दे

आवाज़ें कुछ कहनें दे
कब तक रहूँ मैं चुप.. बहनें दे
आवाजें कुछ कहनें दे
इक तू ही आवारा, बेमंज़िल, बेघर
सब रवैय्या ये मुझपे ही रहनें दे
चल हट जा.. मेरी नजरों से दूर
जैसे बादल हो.. मेरी आँखों से दूर
सह ली हैं मैनें.. लिक्खी सारी ये दस्तूर
अब कुछ करनें दे.. उडने दे
आवाजें कुछ कहनें दे
रहनें दे.. मुझे अपना ना कर
मुझे मुझसा मुझपे रहनें दे
आवाजें कुछ कहनें दे

ज़िंदा था मैं बेमतलब लब को कहनें दे
ग़र सोची थीं हर मात तो मरनें दे
मेरे हमसफर मुझे ये दर्द सहनें दे
क्यूं रूठ के लौटूं
इक ख्वाहिश क्यूं सोच के बैठूं
तमन्नाएँ बोझिल तो रस्तें रहनें दे
आवाजें कुछ करती हैं दिल तो करनें दे
मुझे मुझपे रहनें दे
आवाजें कुछ कहनें दे

नितेश वर्मा

Monday, 9 March 2015

थक चूकिं हैं साँसें हमनशीं कहीं और ले चल

मुझे इन मायूसियों से दूर, कहीं और ले चल
थक चूकिं हैं साँसें हमनशीं कहीं और ले चल

उडते ख्वाब है तो वो भी परिंदों के हौसलों से
और ज़माना कहता हैं बातें कहीं और ले चल

नितेश वर्मा और कहीं और ले चल

Saturday, 7 March 2015

के बुझ गयी हैं साँसें अब कोई शोर ना करेंगें हम

के बुझ गयी हैं साँसें अब कोई शोर ना करेंगें हम
तुम सवालें ना करों अब कोई जोर ना करेंगे हम

के दिन गुजरतें चलें आयें थें तुम्हारें ज़ुल्फों तलें
रहनें दो मुहब्बत अब कोई बरसात ना करेंगे हम

नितेश वर्मा


Tuesday, 3 March 2015

चलो इस बदलतें दौर में ये भी देख आयें

चलो इस बदलतें दौर में ये भी देख आयें
अपनें घर में हम भी थें मेहमां देख आयें

खून रिश्तों का या रिश्तें खून के थें अपनें
बडें परेशां थें इससे हम सबको बेक आयें

मौला तुम अबसे इतना अता करना मुझे
दौलत से कभी खुदको ना हम बेच आयें

सुना था वो सियासी मामला था शहर में
न-जानें अपनें सारें कैसे उस ज़द में आयें

नितेश वर्मा

Monday, 2 March 2015

चलतें हुएं कदम रूक से गये हैं

चलतें हुएं कदम रूक से गये हैं
हम इस भीड में छुप से गये हैं

नहीं चाहतें हैं हम बताएं सबको
वो मिज़ाजे-बात बदल से गये हैं

ज़िंदगी नें कुछ कम ना किया हैं
क्यूं बताएं के क्यूं रूठ से गये हैं

वो ख्याल-ए-तमन्ना वो रातों का
हर-पहर वो मुझमें डूब से गये हैं

थीं ठहराव कहीं दुश्मनें जात जानें
हम सामाजी-बात बिखर से गये हैं

कोई हर्जाना भर के रिहा हुआ हैं
और ता-उम्र होके हम कैद से गये हैं

नितेश वर्मा


Sunday, 1 March 2015

खुदसे मिलनें की कोई तरकीब तो दो

ये याद बनकें ना तुम यूं आया करो
ना बनकें ख्वाब मुझे यूं सताया करो

खुदसे मिलनें की कोई तरकीब तो दो
जालिमों सा होके ना यूं दिखाया करो

मुझमें बसे हो तुम यूं ना-जानें कबसे
अब और ना तुम मुझे आजमाया करो

हर बात तुमसें ही करके लौट आतें हैं
कुछ खातिर मेरें तुम भी दुहराया करो

नितेश वर्मा


मैं टूटता हूँ तो परिंदे घबरा जातें हैं

मुझे मेरे ग़म कुछ और दूर ले चल
बहोत तकलीफ़ हैं कही और ले चल

सफर में कौन-कौन सा शहर हुआ हैं
कौन बेगाना,कश्ती कहीं और ले चल

हैं ना ये बात भी कुछ तुम्हारी जैसी
मगरूर हैं और कहती हैं साथ ले चल

तमाम इरादें उसके, कोई तवज्जों दे
हैं रास्तें की पत्थर मगर साथ ले चल

कोई भूल जाता हैं बेगाना इम्तिहां में
अपनें हो तुम, तो मुझे साथ ले चल

मैं टूटता हूँ तो परिंदे घबरा जातें हैं
ये मकानी शज़र कही और ले चल

नितेश वर्मा