Saturday, 30 January 2016

हम उतने ही पुराने

हम उतने ही पुराने
तुम उतने ही मुनासिब
इश्क़ के बाज़ार में
लिये गुलज़ार बनके
गालिब जुबाँ है हाजिर
तुम एक राही सफ़र के
पगड़ंड़ी हम हुए तुम्हारे
एक छांव की तलाश में
जलते रहे कई आस में
प्यासे समुंदर, किनारे मंजिल
भटक रहे है अब भी
दो जानिब दुश्मन हमारे
सुकून ना ठहरें जिस्म पर
आग लगें है
कमबख्त! शहर में सारे।

नितेश वर्मा

कोई भूत सवार है मुझपर

कोई भूत सवार है मुझपर
ये इश्क़ व्यापार है मुझपर।

दाम मिला ना सही मुझको
साँसें भी दुश्वार है मुझपर।

हुस्न तेरा दरिया सा लगे है
दिल जवाँ उधार है मुझपर।

ख्यालातों से दूर चलो तुम
बहुतों की मजार है मुझपर।

इंसाफ़ इंसानों से करो वर्मा
खड़ी सौ तलवार है मुझपर।

नितेश वर्मा और मुझपर।

नितेश वर्मा और 2016

फिर एक नया साल और पुराना मैं। सिलसिला सुनने-सुनाने का, लिखने-लिखाने का, सीखने-सीखाने का चलता रहेगा। मगर कोशिश यह भी रहेगी कि कुछ पुराने पड़े हुए काम को एक नए से अंदाज़ में निपटा दूं, ताकि अगले साल ये खलिश वाली अनुभूति ना हो। फिलिंग्स को पूरा कर लूं या किसी गटर में फल्अश कर दू। यही है इस साल की इयर रेज्यूलेशन अगले साल के आने तक।
मिलन की आस में.. हाय! ये दिसम्बर भी गुजर गयीं प्यास में।

नितेश वर्मा और 2016 की शुभकामनाएँ।

नोट 📝: हैंगओभर उतरेगी तो कुछ साहित्यिक बात भी करेंगे, फिलहाल इंज्वाय किजीए। खुश रहिये। 

ख्वाब सारे उड़ कर धुँआ हो जाये

ख्वाब सारे उड़ कर धुँआ हो जाये
कुबूल होकर मुझमें दुआ हो जाये।

मैं नहीं मानता हंसी उन लफ्जों को
वक़्त बदलते जो बद्दुआ हो जाये।

सिर्फ ये चराग़ मेरे घर जलता रहा
आँधियों को शर्मं से सजा हो जाये।

हर वक़्त जो हुआ करता है वर्मा
ये खेल प्यार अब जुआ हो जाये।

नितेश वर्मा

ये लहू अब भी सीने में उबल बैठता है

ये लहू अब भी सीने में उबल बैठता है
जब भी इंकलाब दिल में ढल बैठता है।
तुम मुसाफिर हो अजनबी शहर के दोस्त
हर बात शब्दों में कहाँ घुल बैठता है।

नितेश वर्मा

Wednesday, 6 January 2016

अब कोई कविता नहीं लिखी जायेगी

अब कोई कविता नहीं लिखी जायेगी
और ना ही दोस्ती का हाथ बढेगा
ना ही पीठ पर छुरें खाऐंगे
और ना ही तिलमिला के चुप हो जायेंगे
अब इंतहां हो गयी है
सिलसिला ये बंद करना होगा
तुम ज़ख़्म करो, हम दवा करे
तुम आँसू दो, हम उन्हें फुसलाते फिरें
तुम बेखौफ मारो
और हम बेवजह सहते फिरें
माँ, बच्चे, बाप, बेटी, बहू्ँ रोते रहे
भाई कांधे पर कांधे देते रहे
नहीं अब नहीं होगा ऐसा
खामोशी टूट जायेगी इस बार
विद्रोह फूट जायेगा इस बार
तुम सोच लो इस बार
अगली बार कुछ और हो जायेगा
ये दर्द, मरहम किसके हिस्से जायेंगे
जवाबदेह बस इसके तुम होगे
बस तुम.. बस तुम.. बस तुम।


नितेश वर्मा

Saturday, 26 December 2015

एक ख्वाहिश मुझमें खामोश रहती है

एक ख्वाहिश मुझमें खामोश रहती है
देखकर तुझे ना यूं कोई होश रहती है।

कुछ कहना चाहता था बरसों से तुमसे
मगर हाल हर वक़्त मदहोश रहती है।

हिसाबों किताब का जिक्र होगा तुमसे
फिलहाल तो जिगर ये बेहोश रहती है।

तुम जिस्म के हर सिहरन में रहती हो
जो उठे कोई बात तुम निर्दोष रहती है।

नितेश वर्मा और रहती है।