Thursday, 7 April 2016

गुलाब की पंखुड़ियाँ अब सूख चुकी हैं

गुलाब की पंखुड़ियाँ अब सूख चुकी हैं
उन किताबों के वरक़ भी मुरझा गए हैं
मुहब्बत स्याह हो चुकी है हर मायने में
दाग़ जिस्म से होकर दिल में बैठ गई है
जबसे चाँद मेरे आँगन से गायब हुआ है
अल्फ़ाज़ बेमानी से लगते है नजाने क्यूं
उनके ना होने का जिक्र भी रहा मुझमें
वो मौसम ही बदले हैं शायद.. मैं नहीं
अब खिली धूप और खुली हवा नहीं हैं
गुलाब की पंखुड़ियाँ अब सूख चुकी हैं
उन किताबों के वरक़ भी मुरझा गए हैं।

नितेश वर्मा

खामोशियाँ नहीं है मुझमें तेरे बाद

खामोशियाँ नहीं है मुझमें तेरे बाद
परेशां है दिल मेरा मुझमें तेरे बाद

किसी धूप का कोई असर नहीं है
छांव बेकरार सी है मुझमें तेरे बाद

सवाल भी इन लबों के मेरे नहीं है
एक किरदार है यूं मुझमें तेरे बाद

चल पड़ा जो वो जिक्र तेरा मुझमें
रात-भर जागा वो मुझमें तेरे बाद

यूं उम्मीद से ज्यादा नाउम्मीद है
खो गया जाने क्या मुझमें तेरे बाद।

नितेश वर्मा

थोड़ा ज़ज्बाती तौर का लेखक था वो

थोड़ा ज़ज्बाती तौर का लेखक था वो
शाम की उस जिक्र में पापा ने कुछ ऐसे ही बताया था
डोमटोली में कोई पुरानी सी साइकिल चोरी हो गई थी
अखबार वाला अब 3 दिनों तक नहीं आनेवाला था
प्राइमरी स्कूल के इम्तिहान शुरु थे
कल सुबह दीदी को ससुराल लेकर जाना था
माँ के आचार महीनों से बे-बौय्याम थे
दादी की वो चारों धामों की जिरह अलग थी
और तुम्हारा वो फोन कॅाल करके कह देना-
के अब मैं तुम्हारी नहीं रही
जैसे लगा के शरीर में अब जाँ ही नहीं रही
कोलाहल सी वो शाम मायूस हो गई
फिर पड़ोस की काकी ने बताया
कि तुमने मुझे किसी बहाने सुबह बुलाया है
फिर लगा जैसे की सबकुछ ठीक ही है
उस लेखक का मरना
बड़े लोगों के शामों की जिक्र
डोमटोली का रोना-धोना
अखबार वाले के नित नये पैंतरे
बच्चों के इम्तिहान
घर के महिलाओं की खातिरदारी
बस एक तुम्हारे मेरे साथ हो जाने से
कैसे सब कुछ बेहतर हो गया।

नितेश वर्मा

इन लबों पे जो मुस्कुराहट है

इन लबों पे जो मुस्कुराहट है
साँसों के दरम्यान आहट है।

हँसीं शक्लें मुझमें बनती रही
जिंदगी को थोड़ी सी राहत है।

नितेश वर्मा

ज़िन्दगी हमने ऐसे ही गुजारी है

ज़िन्दगी हमने ऐसे ही गुजारी है
जो है, जितनी है, सब उधारी है।

कोई काम नहीं तो चुप रहते है
ना कुछ है तो भी जिम्मेदारी है।

बदन को मयस्सर नहीं लिहाफ
जिस्म में खुद एक जाँ भारी है।

बूंद-बूंद गिर रहा मुझसे बेसब्र
साँसें भी सारी हुई व्यापारी है।

अब तो दाग़ ही है चाँद में वर्मा
आईने में कहाँ कोई बेगारी है।

नितेश वर्मा

उसको मैंने चाहा बहोत है

उसको मैंने चाहा बहोत है
ज़बानी कुछ ठीक-ठीक
मैं बता भी नहीं सकता
हालांकि ये समझाने की मैंने
कई दफा कोशिश की है
पुकारा है उसे दिल से
कई बार गुजारी है रात
इस वियोग में के वो आएगी
लौटकर मेरी इन बाहों में
फिर मैं भी हो जाऊँगा
बिलकुल ठीक
ठीक उसकी तरह जैसे के
वो रहती है मेरे दिल के दरम्यान।

नितेश वर्मा

यूं गुनहगारों में भी शामिल नहीं है हम

यूं गुनहगारों में भी शामिल नहीं है हम
करें शिकायतें हुए काबिल नहीं है हम।

हर रोज़ लिखें औ' मशहूर भी हो जाये
इतने बड़े अदबी कामिल नहीं है हम।

जाँ लेके जाओगे तो क्या जाओगे तुम
हसरतों के जाति साहिल नहीं है हम।

पत्थर हमारे घर पे क्यूं मार देगा कोई
अब इतने भी नाकामिल नहीं है हम।

ये चंद रोज़ पहले की बात है सुनो तो
अदब-ए-जबाँ है जाहिल नहीं है हम।

नितेश वर्मा और नहीं है हम।