Wednesday, 30 September 2015

समझो फिर तुम परेशां हो

जब चेहरे से दर्द रिसनें लगें
बंधी सारी ख्वाब टूटनें लगें
बात जुबां की बिगड़ने लगें
नींदों से रात बिछड़ने लगें
समझो फिर तुम परेशां हो

कोई कोशिश काम ना करें
शामों में भी आराम ना करें
शख्स बज़्म में जो तन्हा रहे
खुशी में भी विश्राम ना करें
समझो फिर तुम परेशां हो

चीखती पुकारें सुन ना सके
मरहम दर्द को चुन ना सके
दरिया प्यास को धुन ना सके
राग जो कबीरा बुन ना सके
समझो फिर तुम परेशां हो

अपराधी जब हो बेखौफ घूमें
सूरज की किरणें रोशनी ढूंढें
माँ तरसे जो बूंद भर पानी को
बाप की लाचारी बोतल सूंघें
समझो फिर तुम परेशां हो
समझो फिर तुम परेशां हो।

नितेश वर्मा

Tuesday, 29 September 2015

फिर तुमको सोचना होगा

अगर धूप से छाँव ड़रने लगे
पश्चिमी हवाएँ भी सहम कर बहने लगे
शहर से दूर बसी गाँव बिखरने लगे
अपनों की जिक्र पे जुबां मुकरने लगे
फिर तुमको सोचना होगा

किताबें जब झूठी दास्ताँ बताने लगे
मजहब जब कोई कौम बुरा बताने लगे
कोई तस्वीर जब ड़राने लगे
दरख्त भी सायों में गम गुनगुनाने लगे
फिर तुमको सोचना होगा

बादल आए और बरसें भी ना
संदेश भी जब शहर को सोहाये ना
बात अंग्रेजों को हिन्दी की भाये ना
दिल हो अखबार पर लिख पाये ना
फिर तुमको सोचना होगा

परिंदों की उड़ान जब जमीं ढूंढें
घरों की मकान जब वजह ढूंढें
लौट कर बच्चे जब माँ ना पुकारें
दर्द भी जाने को जब रिश्वत माँगें
फिर तुमको सोचना होगा

फिर तुमको जगना होगा हर गहरी नींद से
चलना होगा निर्भय.. अपने हक को
छीनना होगा.. मुक्कदर से लड़ना होगा
ऐसा होगा तो सोच लो.. चुप नहीं रहना होगा
फिर तुमको सोचना होगा
फिर तुमको सोचना होगा।

नितेश वर्मा और फिर तुमको सोचना होगा ।

मुझको हर शख्स छोड़ देता है राहों में

मुझको हर शख्स छोड़ देता है राहों में
शायद मैं रस्ता हूँ मुसाफिर के चाहों में

वो बुलंद रखता हैं आवाज़ अपनी वर्मा
बेखौफ हैं बच्चा अपनी माँ की बाहों में

नितेश वर्मा और माँ

Sunday, 27 September 2015

बातों के आड़ में लतियाते रहिये

बातों के आड़ में लतियाते रहिये
ऐसी है बात तो बतियाते रहिये।

इल्जाम सारे शहर के मुझसे हैं
हँसीं लब आप गुनगुनाते रहिये।

कितनी परेशान हैं आँखें तुम्हारी
नजरें यूं मुझसे भी मिलाते रहिये।

मैं तंग हूँ तुम सुल्झी किताब हो
इस दीवानें को भी पढाते रहिये।

जिंदगी भर गम ही मिले हैं वर्मा
खूनी सर हर बार कटाते रहिये।

नितेश वर्मा

कोई आवाज़ हैं जो आवाज़ कर रही हैं कानों में

कोई आवाज़ हैं जो आवाज़ कर रही हैं कानों में
दुरुस्त हैं हाल उनका करकें सवाल मकानों में।

बुझा दिया जाता हैं शाम के जलते उस दीप को
यूंही बेगैरत गुजरतीं हैं रात अपनी भी वीरानों में

शर्मिंदा अब हर शख्स हैं मेरे भी उस शहर का
देखते हैं जो अब गूँजता हैं नाम मेरा जहानों में।

बदल कर अपने अक्स को कितनी दूर चला हैं
जो ढूंढता हैं खुशियाँ सारी बिक्र की सामानों में

मेरे गम में भी वो बेहिसाब मौज करता है वर्मा
मैं याद आता हूँ जैसे नाम हो कोई ये बेगानों में।

नितेश वर्मा

Friday, 25 September 2015

यही अच्छा रहेगा

काल्पनिक चरित्र सचित्र मस्तिष्क में पड़े हैं
स्वप्नविहीन हैं और कष्टदायी भी
परंतु परम्परागत मनोरंजित करती हैं
अवशेषों से ह्रदय लगाकर उब गया हूँ
यादें कुंठित करती हैं
तुम चली जाओ.. यही अच्छा रहेगा
मैं ठहर जाऊँ.. यही अच्छा रहेगा।

नितेश वर्मा और यही अच्छा रहेगा।


पापा जब भी ये कहते

मुझे नहीं लगता कुछ होने जाने वाला है
पापा जब भी ये कहते
माँ उन्हें एक ठंडे ग्लास का पानी
मुस्कुरा कर पकड़ा देती
मैं आँगन के बीच में बिछी चटाई पर
चुपचाप सर झुकाएँ अपनी हिन्दी के
किताब की उसी कविता को दुहरा देता
जो मुझे हर दफा डाँट सुनने के बाद
गुनगुनाना होता था
जो मुझे याद होता था बिलकुल लयबद्ध
धीरे-धीरे मैं कविता में रम जाता
पापा रेडियो आन कर लेते
माँ शाम की पकौडियाँ तलने लगती
आसमान में तारें बिछने लगते सुदूर
सब खूबसूरत लगने लगता
फिर हौले-हौले हवा भी चलने लगती
जब कभी तुम आ जाती।

नितेश वर्मा