Tuesday, 1 September 2015

उस पीपल के पेड़ के नीचे

उस पीपल के पेड़ के नीचे
जो हम दोनों के घर से दूर था
उस कुएँ के सूखें से जमीं से
जो पानी के छलकने से भी
बंजर ही पड़ा रहता था
पेड़ के पत्ते सूखकर टूट जाते
टहनियाँ अकड़कर मुड़ जाती
तुम लाज से मारे पानी भरती रहती
आँखों से मेरे नीर बहते रहते
तुम खामोश रहती, मैं खामोश रहता
एक दिन सबने जोर की आवाज़ की
मुहब्बत दबी-सहमी रह गयी
एक भीड़ ने पीपल काट दिया
एक ने वहाँ कई खून कर दिये
अब वहाँ बारिश होती है
सूरज की किरणें आँखों में दिखती है
फसलें वहाँ लहलहाती है
सब सुनहला अच्छा लगता है
जिसको पता नहीं के कभी
यहाँ कोई दो दिल मचलता था
उसको सब अच्छा-अच्छा लगता है
उस पीपल के पेड़ के नीचे
जो हम दोनों के घर से दूर था
उस कुएँ के सूखें से जमीं से
जो पानी के छलकने से भी
बंजर ही पड़ा रहता था।

नितेश वर्मा और पीपल का पेड़।

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